शारदीय नवरात्रि (Shardiya Navratri) 2027: कब से है नवरात्रि, कलश स्थापना, नौ देवियों की पूजा, विधि और महत्व

भारत के सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक पर्वों में शारदीय नवरात्रि का विशेष स्थान है। नौ रातों और दस दिनों तक चलने वाला यह पर्व मां दुर्गा और देवी शक्ति के विभिन्न स्वरूपों की आराधना को समर्पित है।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!देश के अलग-अलग हिस्सों में शारदीय नवरात्रि अलग-अलग परंपराओं के साथ मनाई जाती है। कहीं नौ दिनों तक व्रत और दुर्गा पूजा होती है, कहीं भव्य पंडाल लगाए जाते हैं, तो गुजरात में गरबा और डांडिया, पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा और बिहार में दुर्गा मंदिरों तथा पूजा पंडालों की अपनी विशेष परंपराएं दिखाई देती हैं।
भारत सरकार के पर्यटन मंत्रालय के Utsav पोर्टल के अनुसार शारद ऋतु में मनाई जाने वाली यह नवरात्रि हिंदू चंद्र कैलेंडर के आश्विन महीने में आती है और इसे चार प्रमुख नवरात्रियों में सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है।
शारदीय नवरात्रि 2027 में 30 सितंबर से शुरू होगी और 9 अक्टूबर 2027, शनिवार को विजयादशमी/दशहरा के साथ इसका समापन होगा। बिहार सरकार के 2027 कैलेंडर में भी 30 सितंबर को दुर्गा पूजा कलश स्थापना दर्ज है।
आइए जानते हैं शारदीय नवरात्रि 2027 कब है, कलश स्थापना कब होगी, नौ दिनों में किस देवी की पूजा की जाती है, पूजा सामग्री क्या है, व्रत के नियम क्या हैं और नवरात्रि का धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व क्या है।
पितृ पक्ष की समाप्ति के बाद शारदीय नवरात्रि का पर्व शुरू होता है।
शारदीय नवरात्रि (Shardiya Navratri) 2027 कब है?
शारदीय नवरात्रि 2027 में गुरुवार, 30 सितंबर से शुरू होगी।
नवरात्रि का पहला दिन आश्विन शुक्ल प्रतिपदा माना जाता है और इसी दिन सामान्यतः कलश स्थापना या घटस्थापना की जाती है। नौ दिनों तक मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना होती है। इसके बाद विजयादशमी यानी दशहरा मनाया जाता है।
2027 में शारदीय नवरात्रि की शुरुआत 30 सितंबर से होगी। दुर्गा अष्टमी 7 अक्टूबर, महानवमी 8 अक्टूबर और विजयादशमी 9 अक्टूबर को पड़ेगी।
शारदीय नवरात्रि (Shardiya Navratri) 2027 की मुख्य जानकारी
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| पर्व | शारदीय नवरात्रि |
| शुरुआत | 30 सितंबर 2027, गुरुवार |
| कलश स्थापना | 30 सितंबर 2027 |
| नवरात्रि की मुख्य अवधि | 30 सितंबर से 9 अक्टूबर 2027 |
| दुर्गा अष्टमी | 7 अक्टूबर 2027, गुरुवार |
| महानवमी | 8 अक्टूबर 2027, शुक्रवार |
| विजयादशमी / दशहरा | 9 अक्टूबर 2027, शनिवार |
| मुख्य आराध्या | मां दुर्गा / आदिशक्ति |
| पर्व का आधार | आश्विन मास का शुक्ल पक्ष |
| विशेष परंपराएं | व्रत, दुर्गा पूजा, कलश स्थापना, कन्या पूजन और हवन |
नोट: घटस्थापना का मुहूर्त, तिथि और पूजा का समय शहर के अनुसार बदल सकता है। ऊपर दी गई तारीखें उपलब्ध 2027 पंचांग गणना पर आधारित हैं। बिहार, विशेषकर मधुबनी और मिथिला में पूजा करने वाले श्रद्धालु अंतिम मुहूर्त के लिए अपने स्थानीय पंचांग को प्राथमिकता दें।
शारदीय नवरात्रि (Shardiya Navratri) क्या है?
शारदीय नवरात्रि मां शक्ति की आराधना का नौ रातों तक चलने वाला प्रमुख हिंदू पर्व है।
“शारदीय” शब्द शरद ऋतु से आया है। यह नवरात्रि आमतौर पर सितंबर या अक्टूबर में आती है।
नवरात्रि में देवी शक्ति के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है। लोकप्रिय परंपरा में इन नौ स्वरूपों को नवदुर्गा कहा जाता है।
नौ दिनों की पूजा के बाद दसवें दिन विजयादशमी या दशहरा मनाया जाता है।
भारत सरकार के पर्यटन मंत्रालय के अनुसार शारदीय नवरात्रि को देवी शक्ति की आराधना और बुराई पर अच्छाई की विजय से जोड़ा जाता है।
नवरात्रि को शारदीय नवरात्रि क्यों कहा जाता है?
भारत में वर्ष के अलग-अलग समय पर नवरात्रि की परंपराएं हैं। लेकिन आश्विन महीने में शरद ऋतु के दौरान आने वाली नवरात्रि को शारदीय नवरात्रि कहा जाता है।
इसी कारण इसे कई जगह महानवरात्रि भी कहा जाता है।
इस समय मौसम में भी परिवर्तन शुरू होता है और भारतीय धार्मिक कैलेंडर में यह अवधि देवी आराधना, व्रत और उत्सवों से जुड़ी होती है।
शारदीय नवरात्रि (Shardiya Navratri) 2027 की तारीखें
2027 में शारदीय नवरात्रि का दैनिक क्रम इस प्रकार रहेगा:
| तारीख | दिन | प्रमुख पूजा |
|---|---|---|
| 30 सितंबर | गुरुवार | घटस्थापना, मां शैलपुत्री |
| 1 अक्टूबर | शुक्रवार | मां ब्रह्मचारिणी |
| 2 अक्टूबर | शनिवार | मां चंद्रघंटा |
| 3 अक्टूबर | रविवार | मां कूष्मांडा |
| 4 अक्टूबर | सोमवार | मां स्कंदमाता |
| 5 अक्टूबर | मंगलवार | मां कात्यायनी |
| 6 अक्टूबर | बुधवार | मां कालरात्रि |
| 7 अक्टूबर | गुरुवार | दुर्गा अष्टमी / महाअष्टमी, मां महागौरी |
| 8 अक्टूबर | शुक्रवार | महानवमी, मां सिद्धिदात्री |
| 9 अक्टूबर | शनिवार | विजयादशमी / दशहरा |
2027 की उपलब्ध पंचांग गणना के अनुसार शारदीय नवरात्रि की शुरुआत 30 सितंबर को होगी। दुर्गा अष्टमी 7 अक्टूबर, महानवमी 8 अक्टूबर और विजयादशमी 9 अक्टूबर को मनाई जाएगी।
नवरात्रि के दौरान तिथियों की गणना और देवी-पूजा के क्रम में स्थानीय पंचांग तथा क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार अंतर हो सकता है। विशेष रूप से बंगाल की दुर्गा पूजा और अन्य क्षेत्रों की नौदिवसीय नवरात्रि में अनुष्ठानों का क्रम अलग हो सकता है।
नोट: बिहार, विशेषकर मधुबनी और मिथिला में पूजा करने वाले श्रद्धालु घटस्थापना, अष्टमी, नवमी और हवन के सटीक मुहूर्त के लिए स्थानीय पंचांग को प्राथमिकता दें।
कलश स्थापना 2027 कब होगी?
कलश स्थापना 30 सितंबर 2027, गुरुवार को होगी।
कलश स्थापना, जिसे घटस्थापना भी कहा जाता है, शारदीय नवरात्रि के प्रारंभ का महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान है। इस दिन भक्त मां दुर्गा की आराधना का संकल्प लेते हैं और नौ दिनों की पूजा शुरू करते हैं।
पंचांग परंपरा में कलश स्थापना के लिए आश्विन शुक्ल प्रतिपदा के दौरान उपयुक्त शुभ मुहूर्त को महत्व दिया जाता है। मुहूर्त निर्धारित करते समय तिथि, सूर्योदय और स्थानीय पंचांग की गणना देखी जाती है।
2027 में कलश स्थापना का सटीक घटस्थापना मुहूर्त शहर के अनुसार अलग हो सकता है। इसलिए मधुबनी, पटना, दिल्ली, मुंबई या किसी दूसरे शहर के लिए एक ही समय को अंतिम मानना उचित नहीं है।
सलाह: पूजा करने से पहले अपने शहर के स्थानीय पंचांग में 30 सितंबर 2027 का घटस्थापना मुहूर्त अवश्य देख लें।
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कलश स्थापना का महत्व
कलश स्थापना को नवरात्रि के दौरान देवी शक्ति के आवाहन से जुड़ा महत्वपूर्ण अनुष्ठान माना जाता है।
सामान्यतः कलश में जल भरकर उसके ऊपर नारियल रखा जाता है। कलश के आसपास जौ बोने की परंपरा भी कई परिवारों में है।
जौ के अंकुरित होने को नवरात्रि के दौरान शुभता और समृद्धि से जोड़कर देखा जाता है।
कलश के साथ:
- नारियल
- आम के पत्ते
- जल
- अक्षत
- रोली
- मौली
- जौ
- मिट्टी
- फूल
आदि का प्रयोग स्थानीय परंपरा के अनुसार किया जा सकता है।
नवरात्रि में मां दुर्गा के नौ स्वरूप
नवरात्रि के नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ प्रमुख स्वरूपों की पूजा की जाती है।
इन्हें नवदुर्गा कहा जाता है।
1. मां शैलपुत्री
पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है।
“शैल” का अर्थ पर्वत है। धार्मिक परंपरा में उन्हें पर्वतराज हिमालय की पुत्री माना जाता है।
उनका वाहन वृषभ और हाथ में त्रिशूल तथा कमल का वर्णन मिलता है।
2. मां ब्रह्मचारिणी
दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है।
यह स्वरूप तपस्या, संयम और साधना का प्रतीक माना जाता है।
3. मां चंद्रघंटा
तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा की जाती है।
उनके मस्तक पर अर्धचंद्र होने के कारण उन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है।
उनका स्वरूप साहस और शक्ति से जुड़ा माना जाता है।
4. मां कूष्मांडा
चौथे दिन मां कूष्मांडा की पूजा की जाती है।
धार्मिक परंपरा में उन्हें सृष्टि की ऊर्जा से संबंधित देवी के रूप में वर्णित किया जाता है।
5. मां स्कंदमाता
पांचवें दिन मां स्कंदमाता की पूजा की जाती है।
उन्हें भगवान कार्तिकेय अर्थात स्कंद की माता के रूप में जाना जाता है।
6. मां कात्यायनी
छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा की जाती है।
देवी का यह स्वरूप शक्ति, साहस और दुष्ट शक्तियों के विनाश से जुड़ा है।
7. मां कालरात्रि
सातवें दिन मां कालरात्रि की पूजा की जाती है।
उनका स्वरूप उग्र माना जाता है और उन्हें नकारात्मक शक्तियों के विनाश से जोड़ा जाता है।
8. मां महागौरी
आठवें दिन मां महागौरी की पूजा की जाती है।
उन्हें शांति, पवित्रता और सौम्यता से संबंधित देवी स्वरूप माना जाता है।
9. मां सिद्धिदात्री
नौवें दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है।
धार्मिक परंपरा में उन्हें सिद्धियों की दात्री माना गया है।
नवरात्रि की कथा
शारदीय नवरात्रि से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध कथाओं में महिषासुर और मां दुर्गा की कथा है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार महिषासुर ने कठोर तपस्या करके वरदान प्राप्त किया और अत्यंत शक्तिशाली हो गया। उसके अत्याचारों से देवता और मनुष्य परेशान होने लगे।
इसके बाद देवताओं की शक्तियों से देवी आदिशक्ति का प्राकट्य हुआ।
देवी ने महिषासुर के साथ युद्ध किया।
यह युद्ध नौ दिनों तक चला और दसवें दिन देवी ने महिषासुर का वध किया।
इसी विजय को विजयादशमी से जोड़ा जाता है।
भारत सरकार के Utsav पोर्टल पर भी नवरात्रि से जुड़ी महिषासुर वध की इस पौराणिक परंपरा का उल्लेख किया गया है।
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राम और नवरात्रि का संबंध
नवरात्रि से जुड़ी एक अन्य लोकप्रिय धार्मिक परंपरा भगवान श्रीराम से संबंधित है।
लोकप्रिय रामायण परंपरा में माना जाता है कि रावण के विरुद्ध युद्ध से पहले श्रीराम ने देवी शक्ति की आराधना की थी।
इसी परंपरा को अकाल बोधन से जोड़ा जाता है।
इसके बाद विजयादशमी के दिन श्रीराम की रावण पर विजय की कथा दशहरा उत्सव का प्रमुख आधार बनती है।
यहां भी अलग-अलग रामायण परंपराओं और क्षेत्रों में कथा के विवरण में अंतर मिल सकता है।
नवरात्रि में व्रत क्यों रखा जाता है?
नवरात्रि के दौरान लाखों लोग व्रत रखते हैं।
धार्मिक दृष्टि से व्रत को:
- आत्मसंयम
- साधना
- देवी आराधना
- मन की एकाग्रता
- सात्विक जीवन
से जोड़ा जाता है।
व्रत रखने के नियम परिवार और परंपरा के अनुसार अलग हो सकते हैं।
कुछ लोग पूरे नौ दिन फलाहार करते हैं, कुछ एक समय भोजन करते हैं और कुछ केवल विशेष दिनों में उपवास रखते हैं।
नवरात्रि में क्या खाया जाता है?
व्रत रखने वाले लोग सामान्यतः अपने परिवार की परंपरा के अनुसार फलाहार या सात्विक भोजन लेते हैं।
आम तौर पर:
- फल
- दूध
- दही
- मखाना
- साबूदाना
- सिंघाड़े का आटा
- कुट्टू का आटा
- सामक चावल
- आलू
- मूंगफली
आदि का प्रयोग किया जाता है।
लेकिन व्रत के खाद्य नियम अलग-अलग समुदायों और परिवारों में भिन्न हो सकते हैं।
नवरात्रि में क्या नहीं खाना चाहिए?
कई परिवार नवरात्रि व्रत में:
- सामान्य अनाज
- मांसाहार
- शराब
- तामसिक भोजन
से परहेज करते हैं।
कुछ परिवार प्याज और लहसुन से भी परहेज करते हैं।
हालांकि व्रत के नियम सार्वभौमिक नहीं हैं। अपने परिवार की धार्मिक परंपरा और स्वास्थ्य की स्थिति के अनुसार भोजन करना उचित है।
नवरात्रि पूजा सामग्री
नवरात्रि पूजा के लिए सामान्यतः निम्न सामग्री रखी जा सकती है:
- मां दुर्गा की तस्वीर या प्रतिमा
- कलश
- जल
- नारियल
- आम के पत्ते
- जौ
- मिट्टी
- रोली
- कुमकुम
- अक्षत
- मौली
- फूल
- माला
- लाल वस्त्र
- धूप
- दीपक
- कपूर
- घी
- फल
- मिठाई
- पंचामृत
- सुपारी
- पान
- लौंग
- इलायची
स्थानीय परंपरा के अनुसार सामग्री में बदलाव हो सकता है।
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शारदीय नवरात्रि की पूजा विधि
सामान्य रूप से नवरात्रि की पूजा इस प्रकार की जा सकती है:
1. पूजा स्थान की सफाई
सबसे पहले पूजा स्थल को साफ किया जाता है।
2. कलश स्थापना
पहले दिन शुभ समय में कलश स्थापित किया जाता है।
3. गणेश पूजा
किसी भी शुभ पूजा की शुरुआत भगवान गणेश के स्मरण से की जाती है।
4. देवी का आवाहन
मां दुर्गा और संबंधित देवी स्वरूप का ध्यान और आवाहन किया जाता है।
5. दीप और धूप
दीपक तथा धूप जलाकर पूजा की जाती है।
6. पुष्प अर्पण
देवी को फूल और माला अर्पित की जाती है।
7. मंत्र और पाठ
दुर्गा सप्तशती, देवी कवच, आरती या परिवार की परंपरा के अनुसार अन्य पाठ किए जा सकते हैं।
8. भोग
देवी को फल, मिठाई और अन्य नैवेद्य अर्पित किया जाता है।
9. आरती
अंत में मां दुर्गा की आरती की जाती है।
दुर्गा सप्तशती क्या है?
नवरात्रि के दौरान दुर्गा सप्तशती का पाठ करने की परंपरा कई परिवारों में है।
इसे देवी माहात्म्य या चंडी पाठ के नाम से भी जाना जाता है।
इसमें देवी शक्ति के विभिन्न रूपों और असुर शक्तियों के साथ उनके संघर्ष का वर्णन मिलता है।
दुर्गा सप्तशती का पाठ विधिपूर्वक करने के लिए जानकार पुरोहित से सही विधि और उच्चारण सीखना उचित है।
दुर्गा अष्टमी 2027 कब है?
दुर्गा अष्टमी 7 अक्टूबर 2027, गुरुवार को होगी।
इसे महाअष्टमी भी कहा जाता है। शारदीय नवरात्रि के दौरान यह मां दुर्गा की आराधना का एक महत्वपूर्ण दिन है।
इस दिन कई स्थानों पर विशेष पूजा, दुर्गा सप्तशती का पाठ, हवन और कन्या पूजन किया जाता है। हालांकि, कन्या पूजन की परंपरा और उसका दिन परिवार तथा क्षेत्रीय रीति-रिवाजों के अनुसार अष्टमी या नवमी को हो सकता है।
2027 की उपलब्ध पंचांग गणना के अनुसार दुर्गा अष्टमी 7 अक्टूबर, गुरुवार को पड़ेगी।
महानवमी 2027 कब है?
महानवमी 8 अक्टूबर 2027, शुक्रवार को होगी।
महानवमी शारदीय नवरात्रि का एक महत्वपूर्ण धार्मिक दिन है। इस दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा, हवन, कन्या पूजन और नवरात्रि के समापन से जुड़े अनुष्ठान कई परंपराओं में किए जाते हैं।
2027 में महानवमी के अगले दिन विजयादशमी यानी दशहरा 9 अक्टूबर, शनिवार को मनाया जाएगा। <Cite refs={[“turn171645search0″,”turn171645search2”]}/>
नोट: अष्टमी, नवमी, हवन और कन्या पूजन के मुहूर्त स्थानीय पंचांग और क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार अलग हो सकते हैं। बिहार, विशेषकर मधुबनी और मिथिला में पूजा करने वाले श्रद्धालु स्थानीय पंचांग को प्राथमिकता दें।
कन्या पूजन क्या है?
नवरात्रि के दौरान कन्या पूजन की परंपरा विशेष रूप से अष्टमी या नवमी को दिखाई देती है।
कई परिवार छोटी कन्याओं को देवी के स्वरूप के रूप में आमंत्रित करके:
- उनके पैर धोते हैं
- भोजन कराते हैं
- प्रसाद देते हैं
- दक्षिणा या उपहार देते हैं
और उनका आशीर्वाद लेते हैं।
कन्या पूजन की विधि और संख्या क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार अलग हो सकती है।
नवरात्रि और विजयादशमी का संबंध
नवरात्रि का समापन विजयादशमी के साथ होता है।
महिषासुर पर मां दुर्गा की विजय और भगवान राम की रावण पर विजय—दोनों कथाएं विजयादशमी के धार्मिक अर्थ से जुड़ी हैं।
इसीलिए दशहरा को सामान्यतः अधर्म पर धर्म और बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक माना जाता है।
बिहार में शारदीय नवरात्रि
बिहार में नवरात्रि धार्मिक पूजा के साथ-साथ स्थानीय सांस्कृतिक उत्सव का रूप भी लेती है।
कई शहरों और गांवों में:
- दुर्गा पूजा पंडाल
- मां दुर्गा की प्रतिमा
- मेला
- सांस्कृतिक कार्यक्रम
- भजन-कीर्तन
- आरती
- कन्या पूजन
जैसे आयोजन होते हैं।
बिहार और मिथिला में नवरात्रि से पहले जितिया व्रत जैसे महत्वपूर्ण लोक-पर्व भी मनाए जाते हैं।
बिहार में थावे दुर्गा मंदिर भी देवी उपासना का प्रसिद्ध केंद्र है। भारत सरकार के पर्यटन मंत्रालय के Utsav पोर्टल के अनुसार थावे में नवरात्रि के अवसर पर विशेष मेले का आयोजन होता है।
मिथिला में नवरात्रि
मिथिला में देवी पूजा की अपनी समृद्ध लोकपरंपरा है।
ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में नवरात्रि के दौरान:
- दुर्गा पूजा
- कलश स्थापना
- देवी पाठ
- आरती
- भजन
- कन्या पूजन
- सामुदायिक पूजा
जैसी परंपराएं दिखाई देती हैं।
मिथिला की धार्मिक संस्कृति में लोकगीतों और स्थानीय देवी परंपराओं का भी महत्वपूर्ण स्थान है।
हालांकि हर गांव और परिवार में पूजा की शैली एक जैसी नहीं होती।
भारत के अलग-अलग हिस्सों में नवरात्रि कैसे मनाई जाती है?
शारदीय नवरात्रि पूरे भारत में एक ही तरीके से नहीं मनाई जाती।
गुजरात
नवरात्रि में गरबा और डांडिया सबसे प्रमुख आकर्षण हैं।
पश्चिम बंगाल
यहां नवरात्रि का समय दुर्गा पूजा के भव्य आयोजन के लिए प्रसिद्ध है।
उत्तर भारत
दुर्गा पूजा, रामलीला और दशहरा की परंपरा प्रमुख होती है।
बिहार
दुर्गा पूजा पंडाल, मंदिर पूजा, मेला और सामुदायिक आयोजन व्यापक रूप से देखने को मिलते हैं।
हिमाचल प्रदेश
देवी मंदिरों और स्थानीय शक्ति परंपराओं का विशेष महत्व है।
भारत सरकार के पर्यटन मंत्रालय के अनुसार नवरात्रि की परंपराएं क्षेत्र के अनुसार काफी अलग हो सकती हैं।
नवरात्रि में गरबा क्यों किया जाता है?
गुजरात में नवरात्रि के दौरान गरबा और डांडिया की विशेष परंपरा है।
गरबा को देवी शक्ति की आराधना और उत्सव से जोड़कर देखा जाता है।
Utsav पोर्टल के अनुसार गुजरात में नवरात्रि के दौरान बड़े स्तर पर गरबा आयोजन होते हैं और यह पर्व वहां प्रमुख सांस्कृतिक उत्सव का रूप ले चुका है।
नवरात्रि के नौ दिनों का आध्यात्मिक महत्व
नवदुर्गा के नौ स्वरूपों को जीवन के अलग-अलग गुणों से जोड़कर देखा जाता है।
| देवी | प्रमुख भाव |
|---|---|
| शैलपुत्री | शक्ति और स्थिरता |
| ब्रह्मचारिणी | तप और संयम |
| चंद्रघंटा | साहस |
| कूष्मांडा | सृजन |
| स्कंदमाता | मातृत्व |
| कात्यायनी | शक्ति |
| कालरात्रि | नकारात्मकता का विनाश |
| महागौरी | शांति और पवित्रता |
| सिद्धिदात्री | सिद्धि और पूर्णता |
यह व्याख्या धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं पर आधारित है।
नवरात्रि में क्या करें?
नवरात्रि के दौरान अपनी परंपरा के अनुसार:
- मां दुर्गा की पूजा करें
- कलश स्थापना करें
- व्रत रखें
- दुर्गा सप्तशती या देवी स्तुति का पाठ करें
- मंदिर जाएं
- कन्या पूजन करें
- जरूरतमंदों को भोजन या दान दें
- घर और पूजा स्थान को स्वच्छ रखें
नवरात्रि में क्या न करें?
धार्मिक परंपराओं के अनुसार कई लोग:
- मांसाहार से बचते हैं
- शराब से दूर रहते हैं
- तामसिक भोजन नहीं करते
- अनावश्यक विवाद से बचते हैं
- पूजा में शुद्धता और अनुशासन रखते हैं
हालांकि इन नियमों में परिवार और समुदाय के अनुसार अंतर हो सकता है।
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क्या नवरात्रि में व्रत रखना जरूरी है?
नहीं।
व्रत रखना व्यक्तिगत धार्मिक आस्था और स्वास्थ्य पर निर्भर करता है।
कोई व्यक्ति पूरे नौ दिन व्रत रख सकता है, कोई केवल पहले और अंतिम दिन, जबकि कोई बिना व्रत रखे सामान्य रूप से देवी की पूजा कर सकता है।
धार्मिक पूजा के लिए व्रत को अनिवार्य मानना सभी परंपराओं में समान नहीं है।
नवरात्रि में स्वास्थ्य का ध्यान रखें
यदि कोई व्यक्ति व्रत रखता है तो पर्याप्त पानी पीना और अपनी स्वास्थ्य आवश्यकताओं का ध्यान रखना जरूरी है।
लंबे समय तक भोजन न करने या बहुत सीमित आहार लेने से कमजोरी हो सकती है।
विशेष रूप से बच्चे, बुजुर्ग, गर्भवती महिलाएं या किसी स्वास्थ्य समस्या वाले व्यक्ति उपवास रखने से पहले चिकित्सकीय सलाह लें।
शारदीय नवरात्रि और प्रकृति
नवरात्रि शरद ऋतु के आरंभिक समय में आती है।
भारतीय संस्कृति में ऋतु परिवर्तन के साथ खान-पान, दिनचर्या और धार्मिक अनुष्ठानों में भी बदलाव दिखाई देता है।
इसलिए नवरात्रि को केवल धार्मिक पर्व के रूप में ही नहीं, बल्कि भारतीय ऋतु और सांस्कृतिक कैलेंडर के एक महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में भी देखा जा सकता है।
शारदीय नवरात्रि (Shardiya Navratri) 2027 और दशहरा
2027 में:
नवरात्रि प्रारंभ — 30 सितंबर, गुरुवार
दुर्गा अष्टमी — 7 अक्टूबर, गुरुवार
महानवमी — 8 अक्टूबर, शुक्रवार
विजयादशमी / दशहरा — 9 अक्टूबर, शनिवार होगा।
इस प्रकार 2027 में शारदीय नवरात्रि के बाद विजयादशमी अगले दिन मनाई जाएगी। हालांकि, दुर्गा पूजा के अनुष्ठानों, हवन और विसर्जन का क्रम क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार अलग हो सकता है।
नोट: पूजा की तिथियों और मुहूर्त के लिए अपने शहर के स्थानीय पंचांग को प्राथमिकता दें।
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शारदीय नवरात्रि (Shardiya Navratri) 2027 FAQs
शारदीय नवरात्रि (Shardiya Navratri) 2026 कब शुरू होगी?
शारदीय नवरात्रि 2027 में गुरुवार, 30 सितंबर से शुरू होगी।
नवरात्रि में कलश स्थापना कब होगी?
कलश स्थापना 30 सितंबर 2027, गुरुवार को होगी।
दुर्गा अष्टमी 2027 कब है?
दुर्गा अष्टमी 7 अक्टूबर 2027, गुरुवार को होगी।
महानवमी 2027 कब है?
महानवमी 8 अक्टूबर 2027, शुक्रवार को होगी।
दशहरा 2027 कब है?
विजयादशमी / दशहरा — 9 अक्टूबर, शनिवार को होगा।
नवरात्रि में कितने दिन व्रत रखा जाता है?
परंपरा के अनुसार कोई पूरे नौ दिन व्रत रखता है, कोई कुछ विशेष दिनों में और कोई व्रत नहीं रखकर केवल पूजा करता है।
नवरात्रि में कौन-कौन सी देवियों की पूजा होती है?
नवरात्रि में नवदुर्गा के नौ स्वरूप—शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री—की पूजा की जाती है।
क्या नवरात्रि और दुर्गा पूजा एक ही है?
दोनों का धार्मिक संबंध देवी शक्ति की आराधना से है, लेकिन क्षेत्रीय परंपराओं में इनके आयोजन का स्वरूप अलग हो सकता है। पश्चिम बंगाल की दुर्गा पूजा और उत्तर भारत की नवरात्रि पूजा इसके अलग-अलग क्षेत्रीय रूपों के उदाहरण हैं।
क्या नवरात्रि में कन्या पूजन किया जाता है?
हां। कई परिवार अष्टमी या नवमी के दिन कन्या पूजन करते हैं। इसकी विधि और संख्या स्थानीय परंपरा के अनुसार अलग हो सकती है।
निष्कर्ष
शारदीय नवरात्रि भारत की सबसे व्यापक और विविध धार्मिक-सांस्कृतिक परंपराओं में से एक है।
2027 में इसकी शुरुआत 30 सितंबर, गुरुवार को कलश स्थापना के साथ होगी। इसके बाद नौ दिनों तक मां दुर्गा और नवदुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की पूजा की जाएगी। 7 अक्टूबर को दुर्गा अष्टमी, 8 अक्टूबर को महानवमी और 9 अक्टूबर को विजयादशमी यानी दशहरा मनाया जाएगा।
नवरात्रि की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि देश के अलग-अलग हिस्सों में इसका रूप अलग दिखाई देता है—कहीं गरबा और डांडिया, कहीं दुर्गा पूजा के भव्य पंडाल, कहीं मंदिरों में विशेष पूजा और कहीं रामलीला एवं दशहरा।
फिर भी इसके केंद्र में एक ही भाव दिखाई देता है—शक्ति की आराधना, आत्मसंयम और धर्म की विजय।
मां दुर्गा की आराधना से जुड़ा यह पर्व भारतीय संस्कृति की विविधता, सामुदायिक एकता और जीवंत धार्मिक परंपराओं का सुंदर उदाहरण है।
ध्यान दें: घटस्थापना, अष्टमी, नवमी, हवन और विसर्जन के मुहूर्त स्थानीय पंचांग तथा क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार अलग हो सकते हैं। पूजा के लिए अपने शहर के पंचांग को प्राथमिकता दें।
All Festivals Of Bihar & Mithila (Mithila Sanskar)

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