पितृ पक्ष 2027: कब से कब तक है, श्राद्ध की तिथियां, विधि, पिंडदान और महत्व

हिंदू धर्म में पितृ पक्ष पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, स्मरण और कृतज्ञता व्यक्त करने की एक महत्वपूर्ण परंपरा है। इसे श्राद्ध पक्ष और महालय पक्ष के नाम से भी जाना जाता है। इस दौरान लोग अपने दिवंगत माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी और अन्य पूर्वजों के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान जैसे धार्मिक कर्म करते हैं।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!पितृ पक्ष केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है। भारतीय पारिवारिक परंपरा में यह वह समय भी है जब लोग अपनी पिछली पीढ़ियों को याद करते हैं और परिवार की परंपराओं तथा संस्कारों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाते हैं।
बिहार में पितृ पक्ष का विशेष महत्व है क्योंकि गया जी पिंडदान और पितृ कर्म के प्रमुख तीर्थस्थलों में से एक है। बिहार पर्यटन के अनुसार गया में फल्गु नदी, विष्णुपद मंदिर, अक्षयवट और अन्य पवित्र स्थलों पर पिंडदान और तर्पण की परंपरा है।
आइए जानते हैं पितृ पक्ष 2027 कब है, श्राद्ध की पूरी तिथि सूची क्या है, किस तिथि को किसका श्राद्ध किया जाता है, श्राद्ध और तर्पण में क्या अंतर है, गया जी में पिंडदान का महत्व क्या है और सर्वपितृ अमावस्या कब होगी।
पितृ पक्ष की समाप्ति के बाद शारदीय नवरात्रि का पर्व शुरू होता है।
पितृ पक्ष 2027 कब है?
पितृ पक्ष 2027 में 15 सितंबर से 29 सितंबर तक श्राद्ध से जुड़ी प्रमुख तिथियां रहेंगी। हालांकि, 15 सितंबर को भाद्रपद पूर्णिमा श्राद्ध है। पितृ पक्ष की नियमित प्रतिपदा श्राद्ध 16 सितंबर 2027 से शुरू होगी और इसका समापन 29 सितंबर 2027 को सर्वपितृ अमावस्या के साथ होगा।
पितृ पक्ष 2027 की मुख्य जानकारी
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| पितृ पक्ष 2027 की प्रमुख अवधि | 15 सितंबर से 29 सितंबर 2027 |
| पूर्णिमा श्राद्ध | 15 सितंबर 2027, बुधवार |
| प्रतिपदा श्राद्ध | 16 सितंबर 2027, गुरुवार |
| मुख्य श्राद्ध अवधि | 16 सितंबर से 29 सितंबर 2027 |
| सर्वपितृ अमावस्या | 29 सितंबर 2027, बुधवार |
| प्रमुख कर्म | श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान |
| प्रमुख पितृ तीर्थ | गया जी, बिहार |
भाद्रपद पूर्णिमा श्राद्ध को नियमित पितृ पक्ष की प्रतिपदा श्राद्ध से अलग समझना चाहिए। 2027 के उपलब्ध पंचांग के अनुसार पूर्णिमा श्राद्ध 15 सितंबर को और प्रतिपदा श्राद्ध 16 सितंबर को है। सर्वपितृ अमावस्या 29 सितंबर को पड़ेगी। <Cite refs={[“turn424625search1″,”turn424625search2″,”turn424625search5”]}/>
तिथि और श्राद्ध मुहूर्त शहर के अनुसार अलग हो सकते हैं। इसलिए वास्तविक अनुष्ठान के लिए स्थानीय पंचांग, अपने परिवार की परंपरा और श्राद्ध करने वाले स्थान के अनुसार निर्धारित मुहूर्त को प्राथमिकता दें।
पितृ पक्ष क्या होता है?
पितृ पक्ष हिंदू पंचांग के अनुसार वह विशेष अवधि है जिसमें पूर्वजों के लिए श्राद्ध, तर्पण और अन्य पितृ कर्म किए जाते हैं।
इस अवधि में परिवार अपने दिवंगत पूर्वजों को याद करता है और उनकी स्मृति में धार्मिक कर्म करता है।
इसे अलग-अलग क्षेत्रों में:
- पितृ पक्ष
- श्राद्ध पक्ष
- महालय पक्ष
- महालय
- श्राद्ध
जैसे नामों से जाना जाता है।
पितृ पक्ष की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सामान्यतः जिस हिंदू तिथि को किसी व्यक्ति का निधन हुआ हो, उसी तिथि के अनुसार पितृ पक्ष में उसका श्राद्ध किया जाता है।
पितृ पक्ष को श्राद्ध पक्ष क्यों कहते हैं?
पितृ पक्ष में किया जाने वाला प्रमुख धार्मिक कर्म श्राद्ध कहलाता है।
श्राद्ध शब्द को सामान्यतः श्रद्धा से जोड़कर समझा जाता है। यानी पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और सम्मान के साथ किया गया धार्मिक कर्म।
इसलिए श्राद्ध केवल भोजन या पिंड अर्पित करने तक सीमित नहीं है। इसका मूल भाव पूर्वजों का स्मरण और उनके प्रति सम्मान है।
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पितृ पक्ष 2027 की पूरी श्राद्ध तिथि सूची
2027 के लिए उपलब्ध पंचांग के अनुसार श्राद्ध की तिथियां इस प्रकार हैं। यह सूची दिल्ली के लिए प्रकाशित Drik Panchang की तिथियों पर आधारित है; गया और मिथिला में अनुष्ठान करने से पहले स्थानीय पंचांग से पुष्टि अवश्य करें।
| तारीख | वार | श्राद्ध |
|---|---|---|
| 15 सितंबर 2027 | बुधवार | पूर्णिमा श्राद्ध |
| 16 सितंबर 2027 | गुरुवार | प्रतिपदा श्राद्ध |
| 17 सितंबर 2027 | शुक्रवार | द्वितीया श्राद्ध |
| 18 सितंबर 2027 | शनिवार | तृतीया श्राद्ध |
| 19 सितंबर 2027 | रविवार | चतुर्थी श्राद्ध |
| 20 सितंबर 2027 | सोमवार | पंचमी श्राद्ध, महाभरणी |
| 21 सितंबर 2027 | मंगलवार | षष्ठी श्राद्ध |
| 22 सितंबर 2027 | बुधवार | सप्तमी श्राद्ध |
| 23 सितंबर 2027 | गुरुवार | अष्टमी श्राद्ध |
| 24 सितंबर 2027 | शुक्रवार | नवमी श्राद्ध |
| 25 सितंबर 2027 | शनिवार | दशमी श्राद्ध |
| 26 सितंबर 2027 | रविवार | एकादशी श्राद्ध |
| 27 सितंबर 2027 | सोमवार | द्वादशी श्राद्ध, मघा श्राद्ध |
| 28 सितंबर 2027 | मंगलवार | त्रयोदशी एवं चतुर्दशी श्राद्ध |
| 29 सितंबर 2027 | बुधवार | सर्वपितृ अमावस्या |
स्रोत: Drik Panchang – 2027 श्राद्ध तिथि सूची
2027 में तिथियों के समायोजन को समझें
2027 की सूची में 28 सितंबर को त्रयोदशी और चतुर्दशी श्राद्ध दोनों दिए गए हैं। इसी तरह 20 सितंबर को पंचमी श्राद्ध के साथ महाभरणी का उल्लेख है। इसलिए श्राद्ध का दिन तय करते समय केवल तारीखों को क्रम से गिनना पर्याप्त नहीं है; संबंधित तिथि और स्थानीय पंचांग को भी देखना चाहिए।
पूर्णिमा श्राद्ध 2027 कब है?
पूर्णिमा श्राद्ध 15 सितंबर 2027, बुधवार को है।
भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा पर पूर्णिमा श्राद्ध किया जाता है। इसे नियमित पितृ पक्ष की प्रतिपदा श्राद्ध से अलग समझना चाहिए। उपलब्ध पंचांग के अनुसार नियमित प्रतिपदा श्राद्ध 16 सितंबर 2027, गुरुवार से शुरू होगी।
पूर्णिमा श्राद्ध और अन्य श्राद्ध कर्मों के कुतुप, रौहिण तथा अपराह्न मुहूर्त शहर के अनुसार अलग हो सकते हैं। इसलिए गया जी, बिहार या मिथिला में वास्तविक अनुष्ठान के लिए स्थानीय पंचांग में दिए गए मुहूर्त को प्राथमिकता दें।
किस दिन किसका श्राद्ध किया जाता है?
सामान्य परंपरा के अनुसार जिस हिंदू तिथि को किसी व्यक्ति का निधन हुआ हो, पितृ पक्ष में उसी तिथि को उसका श्राद्ध किया जाता है।
उदाहरण के लिए:
अगर किसी व्यक्ति का निधन कृष्ण पक्ष सप्तमी को हुआ था, तो पितृ पक्ष की सप्तमी तिथि पर उसका श्राद्ध किया जाता है।
इसी तरह:
- प्रतिपदा → प्रतिपदा तिथि
- द्वितीया → द्वितीया
- तृतीया → तृतीया
- चतुर्थी → चतुर्थी
- पंचमी → पंचमी
- षष्ठी → षष्ठी
- सप्तमी → सप्तमी
- अष्टमी → अष्टमी
- नवमी → नवमी
- दशमी → दशमी
- एकादशी → एकादशी
- द्वादशी → द्वादशी
- त्रयोदशी → त्रयोदशी
- चतुर्दशी → चतुर्दशी
के अनुसार श्राद्ध किया जाता है।
हालांकि वास्तविक तिथि का निर्धारण करते समय मृत्यु की हिंदू तिथि और उस वर्ष के पंचांग को देखना जरूरी है।
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सर्वपितृ अमावस्या 2027 कब है?
सर्वपितृ अमावस्या 29 सितंबर 2027 बुधवार को है।
इसे महालय अमावस्या भी कहा जाता है।
यह पितृ पक्ष का अंतिम दिन है और इसे विशेष महत्व दिया जाता है।
जिन पूर्वजों की मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं हो, या जिनका श्राद्ध उनकी निश्चित तिथि पर किसी कारण से न हो पाया हो, उनके लिए कई परिवार सर्वपितृ अमावस्या को श्राद्ध करते हैं।
पितृ पक्ष में श्राद्ध कैसे किया जाता है?
श्राद्ध की पूरी विधि क्षेत्र, परिवार और परंपरा के अनुसार अलग हो सकती है। सामान्य रूप से इसके प्रमुख चरण इस प्रकार होते हैं:
1. स्नान और शुद्धि
श्राद्ध करने वाला व्यक्ति स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करता है।
2. संकल्प
पूर्वज का नाम और श्राद्ध तिथि का स्मरण करके संकल्प लिया जाता है।
3. पितरों का स्मरण
दिवंगत पूर्वजों को श्रद्धापूर्वक याद किया जाता है।
4. तर्पण
जल और तिल आदि के माध्यम से पितरों के लिए तर्पण किया जाता है।
5. पिंडदान
परंपरा के अनुसार चावल, तिल आदि से पिंड बनाकर अर्पित किए जाते हैं।
6. भोजन अर्पण
पूर्वजों के नाम से भोजन तैयार करके अर्पित किया जाता है।
7. ब्राह्मण भोजन और दान
कई परिवारों में ब्राह्मण को भोजन कराने तथा दान-दक्षिणा देने की परंपरा है।
8. प्रार्थना
अंत में पितरों का स्मरण करके अनुष्ठान पूरा किया जाता है।
ध्यान दें: श्राद्ध की मंत्र-विधि, दिशा, संकल्प और सामग्री में क्षेत्रीय और पारिवारिक अंतर हो सकता है। विशेष श्राद्ध कर्म के लिए स्थानीय पुरोहित की सलाह लेना बेहतर है।
तर्पण क्या होता है?
तर्पण पितृ कर्म का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
इसमें धार्मिक विधि के अनुसार जल आदि अर्पित करके पितरों का स्मरण किया जाता है। कई परंपराओं में तिल का भी प्रयोग किया जाता है।
सरल शब्दों में:
जल का धार्मिक रूप से अर्पण = तर्पण
लेकिन इसके मंत्र और विस्तृत विधि अलग परंपराओं में अलग हो सकती है।
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पिंडदान क्या होता है?
पिंडदान पितृ कर्म से जुड़ी एक महत्वपूर्ण धार्मिक परंपरा है।
इसमें परंपरा के अनुसार चावल, तिल, घी आदि से पिंड बनाकर पूर्वजों के नाम से अर्पित किए जाते हैं।
भारत में गया जी पिंडदान के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है।
बिहार पर्यटन के अनुसार गया में फल्गु नदी, विष्णुपद मंदिर, अक्षयवट और अन्य पवित्र स्थलों पर पिंडदान एवं तर्पण की परंपरा है।
श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान में क्या अंतर है?
इन तीनों शब्दों को अक्सर एक साथ इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन इनके अर्थ और धार्मिक उपयोग में अंतर है।
| कर्म | सामान्य अर्थ |
|---|---|
| श्राद्ध | पितरों के प्रति श्रद्धा से किया जाने वाला व्यापक धार्मिक कर्म |
| तर्पण | जल आदि का अर्पण |
| पिंडदान | पिंड का अर्पण |
इसलिए तर्पण और पिंडदान श्राद्ध कर्म के हिस्से हो सकते हैं, लेकिन तीनों बिल्कुल एक ही चीज नहीं हैं।
गया जी में पिंडदान का महत्व
बिहार का गया जी पितृ पक्ष के दौरान देशभर से आने वाले श्रद्धालुओं का प्रमुख धार्मिक केंद्र है।
बिहार पर्यटन के अनुसार गया में पितृ कर्म के लिए कई प्रमुख स्थल हैं। इनमें:
- फल्गु नदी
- विष्णुपद मंदिर
- अक्षयवट
- सीता कुंड
- प्रेतशिला
- पंचतीर्थ
आदि शामिल हैं।
गया में पिंडदान की धार्मिक परंपरा इतनी महत्वपूर्ण है कि पितृ पक्ष के दौरान यहां विशेष मेला भी आयोजित होता है।
पितृपक्ष मेला 2027 कब है?
गया जी, बिहार में पितृपक्ष मेला 2027 की आधिकारिक तारीखों की घोषणा होने के बाद ही इसकी निश्चित अवधि की पुष्टि की जा सकेगी।
2027 के पंचांग के अनुसार पितृपक्ष की प्रमुख अवधि 15 सितंबर से 29 सितंबर 2027 के बीच रहेगी। इस दौरान गया जी में पिंडदान, तर्पण और श्राद्ध जैसे धार्मिक कर्मों के लिए श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना रहती है।
पितृपक्ष मेला गया की धार्मिक परंपरा के साथ-साथ स्थानीय संस्कृति और पर्यटन की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। इस दौरान देश के विभिन्न हिस्सों से श्रद्धालु अपने पूर्वजों के निमित्त पिंडदान और अन्य धार्मिक अनुष्ठान करने आते हैं।
महत्वपूर्ण सूचना: ऊपर दी गई अवधि पंचांग की प्रमुख तिथियों पर आधारित है, बिहार सरकार द्वारा घोषित मेले की आधिकारिक तारीख नहीं। यात्रा की योजना बनाने से पहले बिहार पर्यटन विभाग की आधिकारिक वेबसाइट या गया जी पितृपक्ष मेला पोर्टल पर नवीनतम सूचना अवश्य देखें।
गया में पितृ पक्ष के दौरान क्या किया जाता है?
गया आने वाले श्रद्धालु अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार:
- फल्गु नदी में तर्पण
- पिंडदान
- विष्णुपद मंदिर में पूजा
- अक्षयवट से संबंधित धार्मिक कर्म
- अन्य वेदियों पर पितृ कर्म
करते हैं।
बिहार पर्यटन के अनुसार गया में पितृ कर्म से जुड़े अनेक धार्मिक स्थल और वेदियां हैं।
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फल्गु नदी और पितृ पक्ष
गया की फल्गु नदी पितृ कर्म से विशेष रूप से जुड़ी हुई है।
पितृ पक्ष में श्रद्धालु यहां तर्पण और पिंडदान करते हैं। बिहार पर्यटन भी फल्गु नदी को गया के प्रमुख पितृ कर्म स्थलों में शामिल करता है।
फल्गु नदी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि गया की पितृ परंपरा में इसका धार्मिक और सांस्कृतिक स्थान बहुत पुराना माना जाता है।
विष्णुपद मंदिर का महत्व
गया का विष्णुपद मंदिर पितृ पक्ष के दौरान आने वाले श्रद्धालुओं के लिए प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है।
बिहार पर्यटन के अनुसार पितृ कर्म के दौरान फल्गु नदी में अनुष्ठान के बाद विष्णुपद मंदिर में पूजा की जाती है।
अक्षयवट का महत्व
गया का अक्षयवट भी पितृ कर्म से जुड़ा महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है।
गया आने वाले श्रद्धालु अपनी धार्मिक परंपरा के अनुसार यहां भी पितृ कर्म करते हैं।
पितृ पक्ष और गया जी की धार्मिक कथा
गया में पिंडदान से जुड़ी अनेक पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं।
लोकप्रिय धार्मिक परंपरा में भगवान श्रीराम द्वारा अपने पिता राजा दशरथ के लिए गया में पिंडदान करने की कथा कही जाती है।
माता सीता से जुड़ी फल्गु नदी और पिंडदान की कथा भी गया की धार्मिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
इन कथाओं को पौराणिक और धार्मिक मान्यता के रूप में समझना चाहिए।
पितृ पक्ष में कौवे को भोजन क्यों दिया जाता है?
भारतीय लोकपरंपरा में कौवे को पितरों से प्रतीकात्मक रूप से जोड़ा गया है।
इसी कारण श्राद्ध के भोजन का एक हिस्सा कौवे के लिए रखने की परंपरा कई परिवारों में है।
कौवे द्वारा भोजन ग्रहण करने को कई लोग धार्मिक दृष्टि से शुभ संकेत मानते हैं।
यह एक धार्मिक लोकविश्वास है, वैज्ञानिक निष्कर्ष नहीं।
पितृ पक्ष में गाय और अन्य जीवों को भोजन
कई परिवारों में श्राद्ध के अवसर पर:
- गाय
- कौवा
- कुत्ता
आदि को भी भोजन कराने की परंपरा है।
इन परंपराओं में जीवों के प्रति करुणा और भोजन साझा करने का सांस्कृतिक भाव भी दिखाई देता है।
स्थानीय परंपरा के अनुसार इसका क्रम और विधि अलग हो सकती है।
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पितृ पक्ष में क्या खाना चाहिए?
पितृ पक्ष में भोजन को लेकर अलग-अलग परिवारों और क्षेत्रों की अपनी परंपराएं होती हैं।
कई परिवार इस अवधि में सात्विक भोजन करते हैं और मांसाहार से परहेज करते हैं।
बिहार पर्यटन की जानकारी में भी पितृ पक्ष के दौरान मांसाहारी भोजन से बचने और कुछ खाद्य पदार्थों को न लेने की पारंपरिक मान्यता का उल्लेख है।
आमतौर पर लोग:
- चावल
- दाल
- सब्जियां
- फल
- दूध
- दही
- घी
- मौसमी खाद्य पदार्थ
जैसे सात्विक भोजन लेते हैं।
हालांकि भोजन संबंधी नियमों में क्षेत्रीय और पारिवारिक अंतर हो सकता है।
पितृ पक्ष में क्या नहीं करना चाहिए?
कई परिवार पितृ पक्ष को सादगी और पितृ स्मरण की अवधि मानते हैं।
इसलिए इस दौरान लोग सामान्यतः:
- मांगलिक समारोहों से बचते हैं
- सात्विक भोजन करते हैं
- पूर्वजों का स्मरण करते हैं
- दान-पुण्य करते हैं
- धार्मिक कर्म करते हैं
कुछ परिवार विवाह, गृहप्रवेश जैसे मांगलिक कार्य इस अवधि में नहीं करते।
यह नियम हर परिवार और समुदाय में बिल्कुल समान नहीं होता।
पितृ पक्ष में दान का महत्व
श्राद्ध के अवसर पर दान करने की भी परंपरा है।
क्षमता और परिवार की परंपरा के अनुसार:
- अन्न
- वस्त्र
- भोजन
- दक्षिणा
- जरूरत की वस्तुएं
दान की जा सकती हैं।
दान को धार्मिक पुण्य के साथ-साथ जरूरतमंद व्यक्ति की सहायता और सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में भी देखा जा सकता है।
क्या पितृ पक्ष केवल बिहार में मनाया जाता है?
नहीं।
पितृ पक्ष भारत के विभिन्न हिस्सों में मनाया जाता है। हालांकि इसकी विधि और स्थानीय परंपराएं अलग हो सकती हैं।
उत्तर भारत में पिंडदान की परंपरा प्रमुख है, जबकि कुछ अन्य क्षेत्रों में तर्पण और महालय अमावस्या के आयोजन को अधिक प्रमुखता दी जाती है।
दक्षिण भारत में पितृ कर्म के लिए अलग-अलग स्थानीय नाम और परंपराएं भी मिलती हैं।
इसलिए पितृ पक्ष एक व्यापक धार्मिक परंपरा है, जबकि गया जी इसका एक प्रमुख तीर्थ केंद्र है।
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बिहार और मिथिला में पितृ पक्ष
बिहार में पितृ पक्ष का महत्व विशेष है।
इसका सबसे बड़ा कारण गया जी की पिंडदान परंपरा है। वहीं मिथिला क्षेत्र में भी परिवार और पूर्वजों से जुड़े संस्कारों का विशेष महत्व रहा है।
मिथिला के परिवार अपनी पारंपरिक विधि और स्थानीय पंचांग के अनुसार श्राद्ध करते हैं।
हालांकि मिथिला के हर परिवार में श्राद्ध की विधि बिल्कुल समान हो, ऐसा जरूरी नहीं है।
पितृ पक्ष और शारदीय नवरात्रि का संबंध
पितृ पक्ष की समाप्ति के बाद हिंदू धार्मिक कैलेंडर में शारदीय नवरात्रि का समय आता है। पितृ पक्ष में जहां पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, तर्पण और श्राद्ध का महत्व है, वहीं शारदीय नवरात्रि में मां दुर्गा और शक्ति के विभिन्न स्वरूपों की आराधना की जाती है।
2027 में प्रमुख तिथियां
- सर्वपितृ अमावस्या — 29 सितंबर 2027, बुधवार
- शारदीय नवरात्रि की घटस्थापना — 30 सितंबर 2027, गुरुवार
इस प्रकार 2027 में सर्वपितृ अमावस्या के अगले दिन शारदीय नवरात्रि की शुरुआत होगी। उपलब्ध पंचांग के अनुसार 30 सितंबर को घटस्थापना की तिथि निर्धारित है।
पितृ पक्ष से नवरात्रि तक का यह क्रम भारतीय धार्मिक परंपरा में पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता और देवी शक्ति की आराधना—दोनों के महत्व को दर्शाता है।
ध्यान दें: घटस्थापना का मुहूर्त और तिथि की गणना स्थान के अनुसार अलग हो सकती है। पूजा करने से पहले अपने शहर के स्थानीय पंचांग में दिया गया समय अवश्य देखें।
पितृ पक्ष 2027: एक नजर में
- पूर्णिमा श्राद्ध: 15 सितंबर 2027, बुधवार
- प्रतिपदा: 16 सितंबर, गुरुवार
- द्वितीया: 17 सितंबर, शुक्रवार
- तृतीया: 18 सितंबर, शनिवार
- चतुर्थी: 19 सितंबर, रविवार
- पंचमी + महाभरणी: 20 सितंबर, सोमवार
- षष्ठी: 21 सितंबर, मंगलवार
- सप्तमी: 22 सितंबर, बुधवार
- अष्टमी: 23 सितंबर, गुरुवार
- नवमी: 24 सितंबर, शुक्रवार
- दशमी: 25 सितंबर, शनिवार
- एकादशी: 26 सितंबर, रविवार
- द्वादशी + मघा श्राद्ध: 27 सितंबर, सोमवार
- त्रयोदशी + चतुर्दशी: 28 सितंबर, मंगलवार
- सर्वपितृ अमावस्या: 29 सितंबर 2027, बुधवार
यह सूची 2027 के लिए उपलब्ध Drik Panchang की श्राद्ध तिथि सूची पर आधारित है।
ध्यान दें: 2027 में पंचमी श्राद्ध के साथ महाभरणी 20 सितंबर को और द्वादशी के साथ मघा श्राद्ध 27 सितंबर को है। इसी तरह त्रयोदशी और चतुर्दशी श्राद्ध दोनों 28 सितंबर को पड़ते हैं। श्राद्ध का वास्तविक मुहूर्त स्थान के अनुसार बदल सकता है, इसलिए गया जी, बिहार या मिथिला में अनुष्ठान के लिए स्थानीय पंचांग को प्राथमिकता दें।
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पितृ पक्ष 2027 FAQs
पितृ पक्ष 2027 कब शुरू होगा?
15 सितंबर 2027, बुधवार को प्रतिपदा श्राद्ध के साथ मुख्य पितृ पक्ष श्राद्ध शुरू होगा। 15 सितंबर को पूर्णिमा श्राद्ध है।
पितृ पक्ष 2027 कब खत्म होगा?
29 सितंबर 2027, बुधवार को सर्वपितृ अमावस्या के साथ पितृ पक्ष समाप्त होगा।
सर्वपितृ अमावस्या 2027 कब है?
29 सितंबर 2027, बुधवार को सर्वपितृ अमावस्या है।
पितृ पक्ष में पिंडदान कहां किया जाता है?
भारत में कई तीर्थस्थलों पर पिंडदान की परंपरा है, लेकिन गया जी पिंडदान के लिए प्रमुख तीर्थस्थलों में से एक है।
क्या गया जाना जरूरी है?
हर व्यक्ति के लिए गया जाना अनिवार्य है, ऐसा कहना उचित नहीं होगा। लोग अपनी पारिवारिक और धार्मिक परंपरा के अनुसार घर पर भी श्राद्ध और तर्पण करते हैं। गया एक विशेष पितृ तीर्थ है।
मृत्यु तिथि पता न हो तो श्राद्ध कब करें?
कई परिवार ऐसी स्थिति में सर्वपितृ अमावस्या को श्राद्ध करते हैं। 2026 में यह 10 अक्टूबर है। व्यक्तिगत परिस्थिति में स्थानीय पुरोहित से तिथि की पुष्टि करना बेहतर है।
क्या पितृ पक्ष में विवाह किया जा सकता है?
कई परिवार पितृ पक्ष में विवाह और अन्य मांगलिक कार्य नहीं करते। यह परिवार और समुदाय की परंपरा पर निर्भर करता है।
पितृ पक्ष में तर्पण क्या है?
तर्पण में धार्मिक विधि के अनुसार जल आदि अर्पित करके पितरों का स्मरण किया जाता है।
पिंडदान क्या है?
पिंडदान में धार्मिक परंपरा के अनुसार पिंड बनाकर पूर्वजों के नाम से अर्पित किया जाता है।
पितृ पक्ष में कौवे को भोजन क्यों दिया जाता है?
लोक और धार्मिक परंपरा में कौवे को पितरों से प्रतीकात्मक रूप से जोड़ा जाता है। इसी कारण श्राद्ध के भोजन का एक हिस्सा कौवे को देने की परंपरा है।
निष्कर्ष
पितृ पक्ष भारतीय संस्कृति में पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता की महत्वपूर्ण परंपरा है।
2027 में 15 सितंबर 2027, बुधवार , 16 सितंबर, गुरुवार से प्रतिपदा श्राद्ध और 29 सितंबर 2027, बुधवार को सर्वपितृ अमावस्या होगी।
इस दौरान श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान जैसे धार्मिक कर्म किए जाते हैं। बिहार का गया जी इस परंपरा का प्रमुख केंद्र है और बिहार पर्यटन के अनुसार यहां फल्गु नदी, विष्णुपद मंदिर, अक्षयवट तथा अन्य स्थलों पर पितृ कर्म किए जाते हैं।
पितृ पक्ष का महत्व केवल धार्मिक कर्मकांड तक सीमित नहीं है। यह हमें अपनी पिछली पीढ़ियों, परिवार की जड़ों और उन लोगों को याद करने का अवसर देता है जिनके जीवन और संस्कारों से वर्तमान पीढ़ी बनी है।
पितृ पक्ष हमें अपनी जड़ों को याद करने और आने वाली पीढ़ी तक अपनी परंपराओं को पहुंचाने का अवसर देता है।
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