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जितिया व्रत (Jitiya Vrat) 2026: जीवित्पुत्रिका की पूरी कथा, पूजा विधि, सामग्री, नहाय-खाय, ओठगन और पारण

जितिया व्रत (jitiya vrat) में संतान की दीर्घायु के लिए पूजा करती मां और जीमूतवाहन की कथा
जितिया व्रत (jitiya vrat) में संतान की दीर्घायु के लिए पूजा करती मां और जीमूतवाहन की कथा

जितिया, जिसे जिउतिया, जीवित्पुत्रिका व्रत, जीवित्पुत्रिका पर्व और जिमूतवाहन व्रत भी कहा जाता है, बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई तथा मिथिला क्षेत्रों में मनाया जाने वाला अत्यंत महत्वपूर्ण लोक-धार्मिक पर्व है। बिहार सरकार के पर्यटन विभाग के अनुसार यह पर्व मुख्यतः बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश में मनाया जाता है और नेपाल में भी इसकी व्यापक परंपरा है।

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यह पर्व बाहर से देखने पर एक कठिन निर्जला व्रत दिखाई देता है, लेकिन इसके भीतर केवल उपवास नहीं है।

इसके भीतर है—

मां की चिंता।

संतान के लिए प्रार्थना।

त्याग।

लोककथा।

जीमूतवाहन का आत्मबलिदान।

चील्हो-सियारो की कहानी।

और एक ऐसी परंपरा, जिसमें सदियों से एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी को यह बताती आई है कि—

संतान के लिए मां का मन कितना दूर तक जा सकता है।

जितिया की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि इसकी कथा एक ही नहीं है। कहीं राजा जीमूतवाहन और गरुड़ की कथा प्रमुख है, कहीं चील्हो-सियारो की लोककथा सुनाई जाती है और कुछ धार्मिक व्याख्याओं में उत्तरा के गर्भ में परीक्षित की कृष्ण द्वारा रक्षा को भी जीवित संतान की रक्षा की भावना से जोड़ा जाता है। इन सभी कथाओं को एक ही शास्त्रीय कथा कहना उचित नहीं होगा; वे इस पर्व की अलग-अलग धार्मिक और लोकपरंपराओं का हिस्सा हैं।

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जितिया (Jitiya Vrat) 2026 कब है?

जितिया की तारीख को समझने के लिए इस पर्व के तीन दिनों को अलग-अलग देखना चाहिए।

बिहार-मिथिला की 2026 परंपरा के अनुसार

तारीखदिनपर्व
3 अक्टूबर 2026शनिवारनहाय-खाय
4 अक्टूबर 2026रविवारमुख्य जितिया / जीवित्पुत्रिका निर्जला व्रत
5 अक्टूबर 2026सोमवारपारण

मिथिला-विशेष 2026 पंचांग स्रोत भी यही तीन-दिवसीय क्रम देता है।

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण पंचांग अंतर है। Drik Panchang के अनुसार 2026 में अष्टमी 3 अक्टूबर सुबह 7:59 बजे शुरू होकर 4 अक्टूबर सुबह 5:51 बजे समाप्त होती है और दिल्ली में जीवित्पुत्रिका व्रत 3 अक्टूबर को दर्शाया गया है।

वहीं बिहार सरकार के 2026 अवकाश कैलेंडर में 5 अक्टूबर को जीवित्पुत्रिका व्रत (जितिया) के रूप में अवकाश दिया गया है।

“जितिया व्रत की तिथि स्थानीय पंचांग और क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार एक दिन आगे-पीछे दिखाई दे सकती है। बिहार-मिथिला की 2026 परंपरा में 3 अक्टूबर को नहाय-खाय, 4 अक्टूबर को मुख्य निर्जला व्रत और 5 अक्टूबर को पारण बताया गया है। अपने स्थानीय पंचांग के अनुसार अंतिम समय अवश्य देखें।”


जितिया (Jitiya Vrat) को जीवित्पुत्रिका क्यों कहते हैं?

जीवित्पुत्रिका शब्द का सामान्य भाव है—जीवित रहने वाली संतान या संतान के जीवित, स्वस्थ और दीर्घायु रहने की कामना।

इसीलिए इस व्रत का केंद्रीय भाव संतान के:

  • दीर्घ जीवन
  • स्वास्थ्य
  • सुरक्षा
  • सुख
  • समृद्धि
  • मंगल

की कामना है।

परंपरागत रूप से यह व्रत माताएं अपनी संतान के लिए रखती हैं। बिहार सरकार का पर्यटन विभाग भी इसे संतान के कल्याण के लिए किया जाने वाला तीन-दिवसीय पर्व बताता है।


जितिया (Jitiya Vrat) की शुरुआत कहां से हुई?

यहीं से कहानी थोड़ी रोचक हो जाती है।

जितिया की कोई एक ऐसी “एकमात्र” उत्पत्ति-कथा नहीं है जिसे हर क्षेत्र और हर परंपरा समान रूप से मानता हो।

इसके पीछे तीन प्रमुख कथा-परंपराएं मिलती हैं:

  1. राजा जीमूतवाहन, गरुड़ और नागपुत्र शंखचूड़ की कथा
  2. चील्हो और सियारो/सियारिन की लोककथा
  3. उत्तरा के गर्भ में परीक्षित की कृष्ण द्वारा रक्षा से जुड़ी धार्मिक मान्यता

पहली कथा जितिया के नाम और उसके त्याग-भाव को समझने के लिए सबसे महत्वपूर्ण है। दूसरी बिहार-मिथिला की लोकपरंपरा में बेहद लोकप्रिय है। तीसरी महाभारत और भागवत की कथा से जुड़ती है, लेकिन इसे जितिया व्रत की “मूल उत्पत्ति” कहना सावधानी के बिना उचित नहीं है।

अब पहले उस कथा में चलते हैं, जिसके कारण जीमूतवाहन इस व्रत के सबसे महत्वपूर्ण पात्रों में शामिल हो गए।


राजा जीमूतवाहन की कहानी: जब एक राजा दूसरे की संतान के लिए अपना जीवन देने निकल पड़ा

बहुत पुरानी बात है।

एक दिन राजा जीमूतवाहन अपने साथी के साथ वन में घूम रहे थे।

तभी उन्हें कुछ ऐसा सुनाई दिया जिसने उनके कदम रोक दिए।

कहीं पास में एक वृद्ध मां रो रही थी।

उसकी आवाज में ऐसा दर्द था जैसे उसके सामने उसकी पूरी दुनिया टूट रही हो।

वह बार-बार कह रही थी—

“हाय पुत्र! हाय पुत्र!”

जीमूतवाहन ने देखा कि एक युवा नाग उसके पास से ले जाया जा रहा है।

युवक भयभीत था।

मां असहाय थी।

जीमूतवाहन ने पूछा—

“तुम क्यों रो रही हो?”

वृद्धा ने बताया कि आज उसके पुत्र शंखचूड़ की बारी है।

उसे गरुड़ के सामने भोजन के रूप में जाना है।

कथा के अनुसार नागों और गरुड़ के बीच ऐसी व्यवस्था थी जिसमें नागों में से एक को गरुड़ के भोजन के लिए भेजा जाता था। उसी दिन शंखचूड़ की बारी थी।

जीमूतवाहन के सामने अब एक कठिन प्रश्न था।

वह किसी दूसरे की मां का पुत्र था।

शंखचूड़ कोई उनका अपना रिश्तेदार नहीं था।

लेकिन जीमूतवाहन ने उस मां का दर्द देख लिया था।

और शायद उस क्षण उन्हें लगा—

“यदि मैं जीवित रहा और इस बच्चे को मरने दिया, तो मेरे जीवित रहने का अर्थ क्या है?”

उन्होंने निर्णय लिया।


जीमूतवाहन ने शंखचूड़ की जगह स्वयं को क्यों रख दिया?

जीमूतवाहन ने शंखचूड़ से कहा कि वह वहां से चला जाए।

वह स्वयं उस स्थान पर बैठेंगे जहां गरुड़ अपने भोजन के लिए आने वाला था।

शंखचूड़ ने विरोध किया।

लेकिन जीमूतवाहन अपने निर्णय से पीछे नहीं हटे।

वह उस वध-शिला पर जाकर लेट गए।

अब वहां एक नाग नहीं था।

एक मनुष्य था।

और वह भी ऐसा मनुष्य जो जानता था कि कुछ ही क्षणों में उसके शरीर पर मृत्यु के पंख उतरने वाले हैं।

कुछ ही देर में गरुड़ वहां पहुंचे।

उन्होंने जीमूतवाहन को अपना शिकार समझा और उन्हें उठा लिया।

कथा के अनुसार गरुड़ ने जीमूतवाहन को घायल किया, लेकिन जीमूतवाहन भयभीत नहीं हुए। वे शांत रहे। गरुड़ को आश्चर्य हुआ कि यह कैसा मनुष्य है जो मृत्यु के सामने भी विचलित नहीं हो रहा।

गरुड़ ने पूछा—

“तुम कौन हो?”

जीमूतवाहन ने अपना परिचय दिया और बताया कि वे एक नागमाता के पुत्र को बचाने के लिए स्वयं उसके स्थान पर आए हैं।

तभी शंखचूड़ भी वहां पहुंच गया।

उसने कहा—

“गरुड़! मुझे छोड़कर इन्हें क्यों ले जा रहे हो? भोजन के लिए मैं ही आया था।”

अब गरुड़ के सामने भी एक असाधारण दृश्य था।

एक व्यक्ति दूसरे की जान बचाने के लिए अपनी जान देने को तैयार था।

और दूसरा व्यक्ति उस व्यक्ति को बचाने के लिए स्वयं मृत्यु के सामने खड़ा था।

यह केवल बलिदान की कहानी नहीं रह गई थी।

यह मानवता की कहानी बन चुकी थी।


गरुड़ ने जीमूतवाहन को क्या वरदान दिया?

जीमूतवाहन की करुणा और साहस से गरुड़ अत्यंत प्रभावित हुए।

कथा के एक प्रचलित रूप में गरुड़ ने उन्हें वरदान दिए और नागों को भविष्य में न खाने का आश्वासन दिया। कुछ पाठ-परंपराओं में जीमूतवाहन को राज्य और वैकुण्ठ प्राप्ति जैसे वरदान मिलने का उल्लेख है।

इसी कथा के कारण जीमूतवाहन का नाम संतान की रक्षा और दूसरे के बच्चे के लिए किए गए त्याग से जुड़ गया।

और यही जितिया के भाव को समझने की सबसे सुंदर कुंजी है।

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मां अपने बच्चे के लिए व्रत रखती है।

जीमूतवाहन दूसरे की संतान के लिए अपना जीवन देने को तैयार हुए।

दोनों कथाओं के केंद्र में एक ही भावना है—

जीवन की रक्षा।


चिल्हो-सियारो की कहानी: जितिया की सबसे लोकप्रिय लोककथा

अब कहानी का दूसरा दरवाजा खुलता है।

यह कहानी शास्त्रीय आख्यान से ज्यादा लोकपरंपरा की कहानी है और बिहार-मिथिला सहित कई क्षेत्रों में जितिया के अवसर पर सुनाई जाती है। इसके कई versions मिलते हैं, इसलिए अलग-अलग गांवों में घटनाओं और पात्रों के नामों में थोड़ा अंतर मिल सकता है।

कहानी शुरू होती है एक जंगल से।

एक पेड़ पर रहती थी—

चिल्हो, यानी चील।

और उसी पेड़ के आसपास रहती थी—

सियारो, यानी सियारिन।

दोनों बहुत अच्छी सहेलियां थीं।

चिल्हो कहीं से भोजन लाती तो उसका एक हिस्सा सियारिन के लिए रखती।

सियारिन भी चिल्हो का ध्यान रखती।

दोनों का जीवन अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार सुख से बीत रहा था।


एक दिन दोनों ने देखा—औरतें जितिया की तैयारी कर रही हैं

एक दिन जंगल के पास गांव में महिलाओं को जितिया की पूजा की तैयारी करते देखकर चिल्हो के मन में भी व्रत करने की इच्छा हुई।

उसने सियारिन से कहा—

“जब ये महिलाएं अपनी संतान की रक्षा और दीर्घायु के लिए व्रत कर रही हैं, तो हम भी यह व्रत करेंगे।”

दोनों ने व्रत करने का संकल्प लिया।

लेकिन असली परीक्षा अगले दिन थी।


व्रत शुरू हुआ और भूख ने परीक्षा लेना शुरू किया

चिल्हो और सियारिन दोनों ने व्रत रखा।

समय बीतता गया।

भूख लगी।

प्यास लगी।

लेकिन चिल्हो ने अपना संकल्प नहीं छोड़ा।

सियारिन के लिए यह कठिन होता गया।

तभी उसे भोजन का अवसर दिखाई दिया।

कथा के विभिन्न versions में यहां अलग-अलग घटनाएं आती हैं—कहीं श्मशान में मांस खाने की बात है, कहीं शव के पास जाकर भोजन करने की, तो कहीं चोरी से मांस खाने की। लेकिन सभी versions का मूल भाव एक ही है:

सियारिन ने व्रत का नियम तोड़ दिया।

चिल्हो ने व्रत पूरा किया।


फिर दोनों का जन्म मनुष्य के रूप में हुआ

समय बीता।

दोनों की मृत्यु हुई।

लोककथा के अनुसार दोनों का अगला जन्म एक ब्राह्मण परिवार में दो बहनों के रूप में हुआ।

कई प्रचलित versions में उनके नाम आते हैं:

शीलवती — पूर्व जन्म की चील।

कर्पूरावती — पूर्व जन्म की सियारिन।

हालांकि लोककथा के दूसरे संस्करणों में क्रम और पारिवारिक विवरण बदलते मिलते हैं। मिथिला में प्रचलित एक लिखित कथा में भी शीलवती और कर्पूरावती के नाम तथा उनके पूर्वजन्म से संबंध का वर्णन मिलता है।

समय बीता।

दोनों की शादी हुई।

शीलवती के घर एक-एक करके सात पुत्र हुए।

दूसरी ओर कर्पूरावती के पुत्र जीवित नहीं रह पाए।

यहीं से कहानी में ईर्ष्या प्रवेश करती है।


सात जीवित पुत्रों को देखकर कर्पूरावती के मन में क्या आया?

कर्पूरावती ने देखा कि उसकी बहन शीलवती के सातों पुत्र स्वस्थ और जीवित हैं।

वह स्वयं संतान-वियोग का दुख झेल रही थी।

उसके मन में सवाल उठा—

“मेरे साथ ही ऐसा क्यों?”

धीरे-धीरे यह दुख ईर्ष्या में बदल गया।

लोककथा के एक प्रचलित version में कर्पूरावती को लगा कि शायद शीलवती ने कोई ऐसा जादू या उपाय किया है जिसके कारण उसके बच्चे बच रहे हैं। बाद में उसने अपनी बहन के बच्चों को नुकसान पहुंचाने का प्रयास किया।


सात बच्चों के सिर और जितिया की शक्ति

कथा के सबसे नाटकीय हिस्से में कर्पूरावती अपने पति से शीलवती के सात पुत्रों को मरवाने की मांग करती है।

राजा अनिच्छुक होते हैं, लेकिन अंततः उसके आग्रह के कारण सातों बच्चों के सिर काटकर भेजे जाते हैं।

कर्पूरावती उन सिरों को ढककर शीलवती के घर भेज देती है।

लेकिन उस समय शीलवती जितिया व्रत कर रही थी।

जब शीलवती के परिवार ने उन ढंकी हुई टोकरियों/डलियों को खोला, तो लोककथा में कहा जाता है कि वहां कटे सिर नहीं बल्कि फल/नारियल दिखाई दिए और शीलवती के सातों पुत्र जीवित लौट आए।

यह हिस्सा अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग रूपों में सुनाया जाता है। कहीं नारियल का उल्लेख है, कहीं अन्य फल का।

कर्पूरावती स्तब्ध रह गई।

तब उसे अपने पूर्व जन्म की बात बताई गई।

वह समझ गई—

जिस व्रत को उसने पिछले जन्म में अधूरा छोड़ा था, उसी की कथा उसके वर्तमान जीवन में लौटकर आई थी।


चिल्हो-सियारो की कथा का संदेश

इस लोककथा को केवल “व्रत तोड़ा तो बच्चे मर गए” के रूप में पढ़ना कहानी के मूल भाव को बहुत छोटा कर देता है।

इसके भीतर कई संदेश हैं:

  • संकल्प में ईमानदारी
  • ईर्ष्या का परिणाम
  • बहनापा
  • कर्म की लोकमान्यता
  • मातृत्व
  • संतान की रक्षा
  • और अंततः क्षमा

इसीलिए यह कथा पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनाई जाती रही है।


महाभारत की कथा और जितिया

श्रीमद्भागवत 1.8 — उत्तरा की प्रार्थना और कृष्ण द्वारा गर्भ की रक्षा

अब तीसरी कथा पर आते हैं।

यह जितिया की मूल पूजा-कथा से अलग महाभारत/भागवत की धार्मिक परंपरा है, लेकिन संतान की रक्षा के भाव के कारण इसे कई जगह जितिया की चर्चा में जोड़ा जाता है।

महाभारत युद्ध समाप्त हो चुका था।

कुरुक्षेत्र ने लगभग पूरा वंश उजाड़ दिया था।

अभिमन्यु मारे जा चुके थे।

उनकी पत्नी उत्तरा गर्भवती थीं।

उस गर्भ में था—

परीक्षित।

यही बच्चा पांडव वंश की अगली कड़ी बनने वाला था।

लेकिन अश्वत्थामा ने उस गर्भ को भी नष्ट करने का प्रयास किया।

भागवत के प्रथम स्कंध में वर्णन मिलता है कि अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र से उत्तरा का गर्भ संकट में पड़ा और भगवान कृष्ण ने परीक्षित की रक्षा की।

उत्तरा ने कृष्ण से अपने अजन्मे बच्चे की रक्षा की प्रार्थना की।

और धार्मिक परंपरा के अनुसार कृष्ण ने गर्भस्थ परीक्षित की रक्षा की।

परीक्षित जीवित रहे।

और आगे चलकर वही पांडव वंश के उत्तराधिकारी बने।

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क्या यह जितिया की मूल कथा है?

ऐसा निश्चित रूप से नहीं कहना चाहिए।

यह महाभारत/भागवत की अपनी कथा है।

बाद की धार्मिक व्याख्याओं में इसे “गर्भस्थ/संतान की रक्षा” के भाव से जितिया से जोड़ा जाता है।

यानी:

जीमूतवाहन कथा = जितिया की प्रमुख व्रत-कथा परंपरा

चिल्हो-सियारो = बिहार-मिथिला की लोकप्रिय लोककथा

उत्तरा-परीक्षित = महाभारत/भागवत की संतान-रक्षा से जुड़ी कथा, जिसे जितिया के भाव से जोड़ा जाता है।

“गर्भ में परीक्षित ने भगवान कृष्ण को देखा”

श्रीमद्भागवत 1.12.7 — गर्भस्थ परीक्षित और भगवान का दर्शन

जितिया व्रत (jitiya vrat) उत्तरा-परीक्षित = महाभारत/भागवत की संतान-रक्षा से जुड़ी कथा, जिसे जितिया के भाव से जोड़ा जाता है।
जितिया व्रत (jitiya vrat) उत्तरा-परीक्षित = महाभारत/भागवत की संतान-रक्षा से जुड़ी कथा, जिसे जितिया के भाव से जोड़ा जाता है।

जितिया तीन दिनों तक क्यों चलता है?

जितिया का पारंपरिक क्रम सामान्यतः तीन चरणों में समझा जाता है:

पहला दिन — नहाय-खाय

शरीर और मन की तैयारी।

दूसरा दिन — मुख्य व्रत

निर्जला उपवास और पूजा।

तीसरा दिन — पारण

व्रत का समापन और भोजन।

बिहार सरकार का पर्यटन विभाग भी इसे तीन-दिवसीय पर्व बताता है और नहाय-खाय, निर्जला व्रत तथा अगले दिन पारण की परंपरा का उल्लेख करता है।


नहाय-खाय क्या होता है?

नहाय-खाय का सीधा अर्थ है—

पहले स्नान, फिर भोजन।

इस दिन व्रती स्नान करके शुद्ध भोजन ग्रहण करती हैं और अगले दिन के कठिन व्रत के लिए शरीर और मन को तैयार करती हैं।

क्षेत्र के अनुसार भोजन बदल सकता है।

बिहार और मिथिला की परंपराओं में नोनी/नोनिया साग, मड़ुआ की रोटी, दही-चूड़ा, झिंगनी/सतपुतिया जैसी सब्जियों का उल्लेख मिलता है।


ओठगन या उठगन क्या है?

जितिया की सबसे विशिष्ट रस्मों में से एक है—

ओठगन।

मिथिला में इसे उठगन भी कहा जाता है।

यह मुख्य निर्जला व्रत शुरू होने से पहले, सामान्यतः सूर्योदय से पहले की जाने वाली भोजन/जल ग्रहण की परंपरा है। कई परिवारों में यह इतना महत्वपूर्ण माना जाता है कि इसके बाद ही निर्जला व्रत की शुरुआत मानी जाती है।

मिथिला की कुछ परंपराओं में ओठगन के लिए दही-चूड़ा और मिठाई का उपयोग होता है तथा इसे पक्षियों के जागने से पहले करने की मान्यता मिलती है।

कुछ परिवारों में संतान की संख्या के अनुसार पत्ते/भाग निकालने और पितरों के लिए हिस्सा रखने की लोकपरंपरा भी मिलती है। यह क्षेत्र-विशेष की परंपरा है, सार्वभौमिक नियम नहीं।


मुख्य जितिया व्रत (Jitiya Vrat) कैसे रखा जाता है?

मुख्य दिन व्रती महिलाएं कठोर उपवास रखती हैं।

लोकप्रिय परंपरा में इसे निर्जला व्रत कहा जाता है—अर्थात भोजन और जल दोनों का त्याग।

बिहार सरकार के पर्यटन विभाग के अनुसार भी यह व्रत बिना पानी के रखा जाता है।

लेकिन यहां एक practical बात बहुत जरूरी है:

निर्जला व्रत धार्मिक परंपरा है, चिकित्सा नियम नहीं।

किसी बीमार व्यक्ति, गर्भवती महिला, बुजुर्ग, छोटे बच्चे या नियमित दवा लेने वाले व्यक्ति के लिए कठोर निर्जला उपवास उचित हो, यह जरूरी नहीं है। ऐसी स्थिति में स्वास्थ्य को प्राथमिकता देना चाहिए।


जितिया (Jitiya Vrat) की पूजा में किसकी पूजा होती है?

यहां भी क्षेत्रीय अंतर है।

कई परंपराओं में राजा जीमूतवाहन मुख्य रूप से पूजे जाते हैं।

कई स्थानों पर उनके साथ:

  • चील
  • सियारिन
  • कुलदेवता
  • शिव-पार्वती
  • गणेश

आदि की पूजा भी की जाती है।

इसलिए article में यह लिखना ज्यादा सही है:

“जितिया की पूजा-पद्धति क्षेत्र और परिवार की परंपरा के अनुसार बदलती है; जीमूतवाहन इसकी प्रमुख पूज्य कथा-परंपरा के केंद्र में हैं।”

कुछ आधुनिक पूजा-विधि स्रोत शिव, पार्वती और गणेश की पूजा का भी उल्लेख करते हैं।


जितिया पूजा की पूरी सामग्री

अब सबसे practical हिस्सा।

जितिया की पूजा सामग्री क्षेत्र के अनुसार बदल सकती है, लेकिन सामान्यतः इनमें से कई चीजें उपयोग होती हैं:

मुख्य पूजा सामग्री

  • कुशा
  • जीमूतवाहन की प्रतिमा/आकृति
  • मिट्टी
  • गाय का गोबर
  • चील की आकृति
  • सियारिन की आकृति
  • अक्षत
  • रोली
  • सिंदूर
  • फूल
  • दूर्वा
  • धूप
  • दीप
  • घी
  • सरसों का तेल
  • पान
  • सुपारी
  • लौंग
  • इलायची
  • फल
  • मिठाई
  • पेड़ा
  • पूजा की थाली
  • जल
  • कलश
  • गांठ वाला धागा
  • जिउतिया/जितिया धागा या आभूषण

ऐसी सामग्री सूचियां बिहार में प्रचलित पूजा-विधियों में मिलती हैं।


जिउतिया धागा या जितिया आभूषण क्या होता है?

जितिया की एक बहुत सुंदर परंपरा है—

जिउतिया पहनना।

कई क्षेत्रों में व्रती महिलाएं विशेष धागा या आभूषण पहनती हैं, जिसे संतान की रक्षा और मंगलकामना से जोड़ा जाता है।

बिहार के कुछ इलाकों में इसके आधुनिक रूप में सोने या चांदी का जिउतिया लॉकेट भी पहना जाता है। स्थानीय समाचार रिपोर्टों में अलग-अलग डिजाइन वाले जिउतिया आभूषणों के उपयोग का उल्लेख मिलता है।


जीमूतवाहन की प्रतिमा कैसे बनाई जाती है?

कई परंपराओं में कुशा से जीमूतवाहन की प्रतीकात्मक आकृति बनाई जाती है।

कुछ स्थानों पर मिट्टी या अन्य उपलब्ध सामग्री का भी प्रयोग किया जाता है।

साथ में चील और सियारिन की आकृतियां मिट्टी या गोबर से बनाने की परंपरा भी मिलती है।


चील और सियारिन की पूजा कैसे की जाती है?

जितिया के पूजा स्थल पर कई परिवार:

  • चील
  • सियारिन
  • जीमूतवाहन

की प्रतीकात्मक आकृतियां रखते हैं।

उन पर सिंदूर, अक्षत, फूल आदि चढ़ाए जाते हैं और फिर व्रत की कथा सुनी जाती है।

कुछ क्षेत्रों में चील-सियारिन को अलग प्रकार का प्रसाद भी दिया जाता है। यह क्षेत्रीय परंपरा है, इसलिए हर परिवार में इसे बिल्कुल एक ही तरीके से करना जरूरी नहीं है।


जितिया (Jitiya Vrat) की पूजा विधि

अब पूरी विधि को आसान क्रम में समझिए।

1. नहाय-खाय

स्नान करें।

स्वच्छ वस्त्र पहनें।

पूजा करें।

सात्त्विक भोजन ग्रहण करें।


2. ओठगन

अगले दिन सूर्योदय से पहले अपने क्षेत्र की परंपरा के अनुसार ओठगन करें।

कई परिवारों में:

दही + चूड़ा + मिठाई

का उपयोग होता है।


3. निर्जला व्रत का संकल्प

ओठगन के बाद मुख्य व्रत शुरू होता है।


4. पूजा स्थान तैयार करें

पूजा स्थल को साफ करें।

जहां परंपरा हो वहां गोबर से लीपें या जल से शुद्ध करें।


5. जीमूतवाहन की स्थापना

कुशा से बनी जीमूतवाहन की आकृति स्थापित करें।


6. चील और सियारिन बनाएं

मिट्टी या गोबर से उनकी प्रतीकात्मक आकृतियां बनाएं।


7. पूजा करें

धूप, दीप, अक्षत, फूल, सिंदूर आदि अर्पित करें।


8. कथा सुनें

यह सबसे महत्वपूर्ण भागों में से एक है।

जीमूतवाहन की कथा और आपके क्षेत्र में प्रचलित चिल्हो-सियारो की कथा सुनी/पढ़ी जाती है।


9. संतान के लिए प्रार्थना

व्रती अपने बच्चों के स्वास्थ्य, दीर्घायु, सुरक्षा और सुख की कामना करती हैं।


10. जिउतिया धारण करें

जहां यह परंपरा है, वहां जिउतिया धागा या आभूषण धारण किया जाता है।


11. पारण

अगले दिन स्थानीय पंचांग के अनुसार पारण किया जाता है।


पारण में क्या खाते हैं?

पारण की परंपरा भी क्षेत्र के अनुसार बदलती है।

बिहार-मिथिला में कई परिवारों में:

  • चावल
  • दही
  • मड़ुआ की रोटी
  • नोनी साग
  • झोर
  • सब्जियां
  • फल
  • स्थानीय पारंपरिक व्यंजन

बनाए जाते हैं।

बिहार सरकार के पर्यटन विभाग ने भी पारण में चावल के आटे की खीर/पेय, खीरा और कुछ क्षेत्रों में नोनी साग व मड़ुआ रोटी जैसी परंपराओं का उल्लेख किया है।

यहां एक universal menu बनाना ठीक नहीं होगा।

जितिया का भोजन जितना धार्मिक है, उतना ही स्थानीय भी है।

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मिथिला में जितिया (Jitiya Vrat) का खास रूप

अगर IndianSwan का audience बिहार और विशेष रूप से मिथिला है, तो यह section बहुत महत्वपूर्ण है।

मिथिला में जितिया केवल पूजा नहीं बल्कि महिलाओं की सामुदायिक स्मृति और लोकसंस्कृति का हिस्सा है।

व्रत के साथ:

  • मैथिली लोकगीत
  • कथा-वाचन
  • बहनों/महिलाओं का सामूहिक मिलना
  • ओठगन
  • जिउतिया धारण करना
  • पारंपरिक भोजन
  • नदी/पोखर स्नान

जैसी परंपराएं देखने को मिलती हैं।

नेपाल के मिथिला क्षेत्रों में भी जितिया की ऐसी ही सामुदायिक परंपराएं मिलती हैं।


जितिया (Jitiya Vrat) में मायके से “भार” आने की परंपरा

बिहार और मिथिला की लोकसंस्कृति में त्योहारों के साथ बेटी के मायके से सामग्री भेजने की परंपरा भी जुड़ी है।

कुछ परिवारों में नवविवाहिता या विवाहित बेटी के लिए:

  • कपड़े
  • ओठगन की सामग्री
  • दही-चूड़ा
  • मिठाई
  • फल
  • श्रृंगार सामग्री
  • जिउतिया

आदि भेजे जाते हैं।

यह धार्मिक अनिवार्यता से ज्यादा परिवार और लोकसंस्कृति की परंपरा है। बिहार की स्थानीय रिपोर्टों में मायके से ओठगन सामग्री भेजने की परंपरा दर्ज है।


जितिया (Jitiya Vrat) के लोकगीत क्यों महत्वपूर्ण हैं?

जितिया के गीतों में केवल पूजा नहीं होती।

इनमें होती है—

मां की चिंता।

बेटे-बेटियों के लिए आशीष।

ससुराल और मायके की स्मृतियां।

बहनों का संबंध।

जीमूतवाहन की कथा।

लोकजीवन की बातें।

यही कारण है कि जितिया को केवल धार्मिक व्रत कहना इसके सांस्कृतिक पक्ष को अधूरा छोड़ देना होगा।


क्या जितिया (Jitiya Vrat) केवल बेटों के लिए है?

परंपरागत नाम जीवित्पुत्रिका और कई पुराने अनुष्ठान पुत्र-केंद्रित भाषा से जुड़े हैं।

लेकिन आज कई परिवार इस व्रत को सभी संतानों के स्वास्थ्य, सुरक्षा और दीर्घायु की कामना के रूप में देखते हैं।

यह आधुनिक सामाजिक बदलाव है, जिसे article में साफ तौर पर “बदलती पारिवारिक व्याख्या” के रूप में रखा जा सकता है।

यानी पुराने अनुष्ठान की भाषा और आज की पारिवारिक भावना को एक ही चीज बताने की आवश्यकता नहीं है।


क्या जितिया (Jitiya Vrat) सबसे कठिन व्रत है?

इसे लोकभाषा में अक्सर “बहुत कठिन व्रत” कहा जाता है क्योंकि निर्जला उपवास की परंपरा है।

लेकिन “सबसे कठिन” कोई शास्त्रीय ranking नहीं है।

यह एक लोकप्रिय भावात्मक अभिव्यक्ति है।


क्या जितिया (Jitiya Vrat) में पानी भी नहीं पीते?

मुख्य पारंपरिक निर्जला व्रत में पानी भी नहीं पीने की परंपरा है। बिहार सरकार का पर्यटन विभाग भी इसे waterless fast के रूप में वर्णित करता है।

लेकिन स्वास्थ्य कारणों से किसी व्यक्ति के लिए ऐसा व्रत सुरक्षित न हो तो उसे अपनी स्थिति के अनुसार निर्णय लेना चाहिए।


क्या जितिया (Jitiya Vrat) में पति भी व्रत रख सकते हैं?

जितिया की प्रमुख परंपरा माताओं द्वारा संतान के लिए व्रत रखने की है।

लेकिन आज परिवारों में पति या अन्य सदस्य भी संकल्प, पूजा या सात्त्विक उपवास के माध्यम से सहभागी हो सकते हैं।

यह पारंपरिक व्रती की भूमिका से अलग है और परिवार की अपनी श्रद्धा पर निर्भर करता है।


क्या संतान न होने पर भी जितिया रखा जाता है?

क्षेत्रीय मान्यताओं में भिन्नता है।

कुछ जगह संतान की इच्छा रखने वाली महिलाएं भी यह व्रत करती हैं, जबकि मुख्य भाव संतान की रक्षा और दीर्घायु का है।

इसे “व्रत रखने से निश्चित रूप से पुत्र प्राप्त होगा” जैसी गारंटी के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं है।


जितिया (Jitiya Vrat) और पितृपक्ष का संबंध

जितिया आश्विन कृष्ण पक्ष में पड़ता है और कई वर्षों में यह पितृपक्ष के दौरान आता है।

इसी वजह से कुछ क्षेत्रीय परंपराओं में पितरों या महिला पूर्वजों के लिए विशेष अर्पण का उल्लेख मिलता है।

मिथिला की कुछ परंपराओं में पितराइन के लिए अलग अर्पण की बात आती है। इसे सार्वभौमिक शास्त्रीय नियम के रूप में नहीं, बल्कि क्षेत्रीय परंपरा के रूप में रखना बेहतर है।


जितिया (Jitiya Vrat) में क्या नहीं करना चाहिए?

क्षेत्रीय नियम अलग हो सकते हैं, लेकिन सामान्य धार्मिक अनुशासन में:

  • व्रत का मजाक नहीं उड़ाना चाहिए।
  • झूठ और विवाद से बचना चाहिए।
  • नशे और तामसिक भोजन से बचने की परंपरा है।
  • पूजा सामग्री की स्वच्छता रखनी चाहिए।
  • कथा को श्रद्धा से सुनना चाहिए।
  • व्रत को दूसरों पर थोपना नहीं चाहिए।

कुछ क्षेत्रीय मान्यताओं में सिलाई-बुनाई, बाल/नाखून काटने आदि से बचने की बातें भी मिलती हैं; इन्हें स्थानीय परंपरा के रूप में ही लिखना चाहिए।


जितिया (Jitiya Vrat) का असली संदेश क्या है?

अब इस पूरे पर्व को एक वाक्य में समझने की कोशिश करें।

जीमूतवाहन ने दूसरे की संतान के लिए अपना जीवन दांव पर लगाया।

चिल्हो-सियारो की कथा ने व्रत, संयम और कर्म की लोकमान्यता को पीढ़ियों तक पहुंचाया।

उत्तरा की कथा में एक मां अपने अजन्मे बच्चे की रक्षा के लिए कृष्ण की शरण लेती है।

और आज एक मां अपनी संतान के लिए व्रत रखती है।

तीनों कथाओं में एक भाव बार-बार लौटता है—

संतान की रक्षा।

यही जितिया की आत्मा है।


जितिया (Jitiya Vrat) की कहानी केवल पुत्र की नहीं, मां के मन की कहानी है

अगर इस पर्व को केवल यह कहकर समाप्त कर दें कि “मां ने 24 घंटे पानी नहीं पिया”, तो हम जितिया का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा खो देंगे।

क्योंकि असली कहानी पानी की बूंद रोकने की नहीं है।

असली कहानी है—

किसी और के दर्द को अपना दर्द मान लेना।

जीमूतवाहन ने यही किया।

किसी की गलती के बावजूद उसे सुधार का अवसर देना।

चिल्हो-सियारो की कथा अंततः यही बताती है।

अजन्मे बच्चे की रक्षा के लिए भगवान की शरण लेना।

उत्तरा की कथा यही भाव देती है।

और—

अपने बच्चे के लिए मां का चिंता करना।

जितिया यही है।


आज के समय में जितिया का अर्थ

आज परिवार बदल गए हैं।

संयुक्त परिवारों की जगह छोटे परिवार आ गए हैं।

लोग शहरों और विदेशों में रहने लगे हैं।

फिर भी जितिया की सुबह जब कोई मां अपने बच्चे के चेहरे को देखती है, तो शायद उस भावना में कोई बहुत बड़ा बदलाव नहीं आया।

बच्चा स्कूल से सुरक्षित लौट आए।

बीमारी से बचा रहे।

जीवन में आगे बढ़े।

उसका घर बसे।

वह स्वस्थ रहे।

यही तो हर मां चाहती है।

और इसी साधारण-सी इच्छा को जितिया ने एक बड़े सांस्कृतिक पर्व में बदल दिया है।


जितिया से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल

जितिया कब मनाया जाता है?

जितिया सामान्यतः आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी से संबंधित व्रत है।

जितिया को और किस नाम से जानते हैं?

इसे जिउतिया, जीवित्पुत्रिका व्रत और जिमूतवाहन व्रत भी कहा जाता है।

जितिया कितने दिन का होता है?

पारंपरिक रूप से इसे तीन चरणों में देखा जाता है—नहाय-खाय, मुख्य व्रत और पारण

जितिया में ओठगन क्या है?

मुख्य निर्जला व्रत शुरू होने से पहले सूर्योदय से पहले किया जाने वाला भोजन/जल ग्रहण संस्कार, जिसे कई क्षेत्रों में ओठगन या उठगन कहते हैं।

जितिया में क्या खाया जाता है?

क्षेत्र के अनुसार दही-चूड़ा, नोनी साग, मड़ुआ रोटी, स्थानीय सब्जियां और अन्य पारंपरिक भोजन होते हैं।

जितिया में किसकी पूजा होती है?

जीमूतवाहन इसकी प्रमुख कथा-परंपरा के केंद्र में हैं। कुछ क्षेत्रों में चील-सियारिन तथा शिव-पार्वती आदि की भी पूजा होती है।

जीमूतवाहन कौन थे?

धार्मिक कथा में वे ऐसे त्यागी राजा/राजकुमार हैं जिन्होंने नागपुत्र शंखचूड़ को बचाने के लिए स्वयं को गरुड़ के सामने प्रस्तुत किया।

चिल्हो-सियारो कौन हैं?

जितिया की प्रसिद्ध लोककथा की चील और सियारिन, जिनके पूर्वजन्म और व्रत-पालन की कथा संतान की रक्षा से जोड़ी जाती है।

क्या चिल्हो-सियारो की कथा शास्त्र में है?

इसे लोककथा/व्रत-कथा परंपरा के रूप में रखना अधिक उचित है। इसके कई regional versions मिलते हैं।

क्या जितिया में पानी नहीं पीते?

मुख्य पारंपरिक निर्जला व्रत में पानी नहीं पीने की परंपरा है।

क्या हर महिला को निर्जला व्रत करना चाहिए?

नहीं। धार्मिक परंपरा और स्वास्थ्य-स्थिति अलग बातें हैं।

क्या जितिया सिर्फ पुत्रों के लिए है?

ऐतिहासिक/लोकपरंपराओं में पुत्र-केंद्रित भाषा मिलती है, लेकिन आज अनेक परिवार इसे सभी संतानों के स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना के रूप में मनाते हैं।

क्या जिउतिया पहनना जरूरी है?

यह क्षेत्रीय परंपरा है; हर जगह इसका तरीका समान नहीं है।

जितिया में जीमूतवाहन की प्रतिमा किससे बनती है?

कई परंपराओं में कुशा से उनकी प्रतीकात्मक प्रतिमा बनाई जाती है।

चील और सियारिन की प्रतिमा किससे बनती है?

कई क्षेत्रों में मिट्टी और गाय के गोबर से।

जितिया का पारण कब होता है?

मुख्य व्रत के अगले दिन नवमी तिथि में, लेकिन सटीक समय स्थानीय पंचांग पर निर्भर करता है।

क्या जितिया में कथा सुनना जरूरी है?

कथा-श्रवण इस पर्व की प्रमुख परंपराओं में है।

क्या जीमूतवाहन और भगवान शिव एक ही हैं?

नहीं। जीमूतवाहन इस व्रत की प्रमुख कथा के नायक हैं; कुछ पूजा-पद्धतियों में शिव-पार्वती की पूजा भी साथ होती है।


निष्कर्ष

जितिया की कहानी किसी एक मंदिर, किसी एक शहर या किसी एक परिवार की कहानी नहीं है।

यह बिहार के गांवों के आंगन में बैठी उन महिलाओं की कहानी है जो कथा सुनते-सुनते अपनी मां को याद करती हैं।

यह मिथिला की उस सुबह की कहानी है जब सूरज निकलने से पहले ओठगन होता है।

यह उस धागे की कहानी है जिसे मां अपनी संतान के मंगल की कामना से धारण करती है।

यह जीमूतवाहन की कहानी है, जिसने कहा—

दूसरे की संतान को मरते हुए देखकर मैं अपने जीवन को कैसे बचा सकता हूं?

यह चिल्हो की कहानी है, जिसने कठिनाई के बावजूद अपना संकल्प नहीं छोड़ा।

यह सियारिन की कहानी है, जो अपनी कमजोरी के कारण नियम तोड़ बैठी और बाद में अपने कर्म का अर्थ समझी।

और यह उत्तरा की कहानी भी है, जिसने अपने अजन्मे बच्चे के लिए कृष्ण को पुकारा।

इसीलिए जितिया को केवल “24 घंटे का निर्जला व्रत” कहना इस पर्व के साथ न्याय नहीं होगा।

जितिया मां की उस प्रार्थना का नाम है जिसमें उसकी अपनी भूख-प्यास से बड़ी उसकी संतान की चिंता होती है।

और शायद यही वजह है कि सदियों बाद भी, जब आश्विन की कृष्ण अष्टमी आती है, बिहार और मिथिला के घरों में एक ही भावना फिर जागती है—

“मेरी संतान स्वस्थ रहे, दीर्घायु हो, सुखी रहे और जीवन में हमेशा सुरक्षित रहे।”

यही है जितिया।

यही है जीवित्पुत्रिका व्रत।

और यही है इस लोकपर्व की सबसे बड़ी कहानी।

जितिया व्रत (jitiya vrat) उत्तरा-परीक्षित = महाभारत/भागवत की संतान-रक्षा से जुड़ी कथा, जिसे जितिया के भाव से जोड़ा जाता है।
जितिया व्रत (jitiya vrat) उत्तरा-परीक्षित = महाभारत/भागवत की संतान-रक्षा से जुड़ी कथा, जिसे जितिया के भाव से जोड़ा जाता है।

✍️ About the Author

Fanish Jha

Fanish Jha is a digital publisher, website creator, and content editor focused on creating useful online resources for Indian audiences. He is the founder and editor of Pincode Of IndiaJobs.PincodeOfIndiaIndian Swan, and Gaon Express.

His work includes website development, digital publishing, SEO, content research, and managing online platforms across postal information, government resources, e-commerce, and local services.

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Founder & Editor — Fanish Jha


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