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चौरचन (चौठचंद्र) 2026: पूजा विधि, सामग्री, कथा, महत्व और सभी परंपराओं की पूरी जानकारी

चौरचन (Chaurchan) 2026 चौठचंद्र पूजा और चंद्रमा की पूजा करते मिथिला परिवार
मिथिला का प्रसिद्ध चौरचन/चौठचंद्र पर्व 2026 में कब है? जानिए तिथि, पूजा सामग्री, पूजा विधि, अरिपन, चंद्रमा को अर्घ्य, स्यमंतक मणि की कथा और चौरचन की सभी प्रमुख मान्यताएं।

चौरचन, जिसे चौठचंद्र, चौठ चाँद, चौरचन्ना, चकचन्ना और चौथ चंद्र जैसे नामों से भी जाना जाता है, मिथिला की सबसे विशिष्ट लोकपरंपराओं में से एक है। यह पर्व मुख्य रूप से बिहार के मिथिलांचल, झारखंड के कुछ मैथिल क्षेत्रों, नेपाल के तराई क्षेत्र तथा देश-विदेश में बसे मैथिल परिवारों द्वारा श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है।

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इस पर्व की सबसे अनोखी बात यह है कि जिस दिन भारत के कई अन्य हिस्सों में गणेश चतुर्थी के कारण चंद्रमा को देखने से बचने की मान्यता है, उसी दिन मिथिला में चंद्रमा की विधिवत पूजा की जाती है और उसे अर्घ्य दिया जाता है।

चौरचन केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं है। इसमें चंद्र पूजा, गणेश पूजा, मिथिला की लोककथाएं, स्यमंतक मणि की कथा, अरिपन, पारंपरिक पकवान, परिवार और सामुदायिक संस्कृति सभी एक साथ दिखाई देते हैं।

बिहार में मनाए जाने वाले प्रमुख लोकपर्व


चौरचन (Chaurchan) 2026 में कब है?

चौरचन/चौठचंद्र 2026 में सोमवार, 14 सितंबर को मनाया जाएगा।

मिथिला क्षेत्र के पंचांग के अनुसार यह पर्व भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है। उपलब्ध पंचांग गणना के अनुसार चतुर्थी तिथि 14 सितंबर 2026 की सुबह लगभग 7:06–7:07 बजे शुरू होकर 15 सितंबर की सुबह लगभग 7:44 बजे तक रहेगी। चूंकि चौरचन की मुख्य पूजा शाम को चंद्रमा के दर्शन के बाद की जाती है, इसलिए पर्व 14 सितंबर को ही मनाया जाएगा।

2026 में चौरचन की मुख्य जानकारी

विवरणजानकारी
पर्वचौरचन / चौठचंद्र
वर्ष2026
तारीख14 सितंबर 2026, सोमवार
तिथिभाद्रपद शुक्ल चतुर्थी
मुख्य पूजाशाम को चंद्रदर्शन के बाद
पूजा का प्रमुख देवताचंद्रदेव
अन्य पूज्य देवतागणेश जी सहित परिवार की परंपरा के अनुसार अन्य देवता
प्रमुख उद्देश्यमिथ्या कलंक से मुक्ति और मंगल की कामना
विशेषताचंद्रमा को अर्घ्य देकर पूजा

ध्यान रखें कि चंद्रमा के उदय का वास्तविक समय स्थान के अनुसार कुछ मिनट अलग हो सकता है। उदाहरण के लिए 14 सितंबर 2026 को मधुबनी में चंद्रमा का उदय लगभग 8:21 AM बताया गया है और शाम को उसका अस्त लगभग 7:35 PM है; लेकिन स्थानीय क्षितिज, पंचांग-पद्धति और चंद्रदर्शन की परंपरा के कारण पूजा के लिए स्थानीय मैथिल पंचांग को प्राथमिकता देना उचित है।


चौरचन क्या है?

चौरचन मिथिला का एक ऐसा लोकपर्व है जिसमें चतुर्थी के चंद्रमा की पूजा की जाती है।

‘चौठ’ का संबंध चतुर्थी तिथि से और ‘चंद्र’ का संबंध चंद्रमा से माना जाता है। इसी कारण इसे चौठचंद्र कहा जाता है। स्थानीय बोलियों और क्षेत्रों में इसके उच्चारण से चौरचन, चौरचन्ना या चकचन्ना जैसे नाम भी प्रचलित हुए।

पर्व के दिन घर की सफाई की जाती है, महिलाएं और परिवार के अन्य सदस्य व्रत रखते हैं, विभिन्न प्रकार के पारंपरिक पकवान तैयार किए जाते हैं और शाम को आंगन में अरिपन बनाकर पूजा की तैयारी की जाती है।

चंद्रमा के दर्शन होने पर उसे अर्घ्य दिया जाता है और चौरचन से संबंधित कथा सुनी या पढ़ी जाती है।


चौरचन क्यों मनाया जाता है?

चौरचन के महत्व को समझने के लिए इसकी अलग-अलग मान्यताओं को समझना जरूरी है।

इस पर्व से जुड़ी प्रमुख मान्यताएं हैं:

  1. गणेश जी और चंद्रमा की कथा
  2. चंद्रमा के ‘कलंक’ की मान्यता
  3. भगवान कृष्ण और स्यमंतक मणि की कथा
  4. मिथ्या आरोप से मुक्ति की मान्यता
  5. मिथिला के राजा हेमांगद ठाकुर से जुड़ी ऐतिहासिक/लोकपरंपरा
  6. महारानी हेमलता द्वारा चंद्रपूजा की परंपरा को आगे बढ़ाने की मान्यता

इनमें से कुछ बातें पुराण और धार्मिक आख्यान से संबंधित हैं, जबकि हेमांगद ठाकुर से जुड़ी बातें इतिहास और लोकपरंपरा के मिश्रण के रूप में मिलती हैं। इसलिए इन्हें एक ही स्तर का प्रमाणित इतिहास नहीं मानना चाहिए।


गणेश जी और चंद्रमा की कथा

चौरचन से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध पौराणिक मान्यता भगवान गणेश और चंद्रदेव से संबंधित है।

कथा के अनुसार, एक बार भगवान गणेश को देखकर चंद्रदेव ने उनका उपहास किया। गणेश जी इससे नाराज हुए और उन्होंने चंद्रमा को श्राप दिया कि जो व्यक्ति गणेश चतुर्थी के दिन चंद्रमा को देखेगा, उसे झूठे कलंक या मिथ्या आरोप का सामना करना पड़ सकता है।

इसी कथा के कारण अनेक हिंदू परंपराओं में गणेश चतुर्थी पर चंद्रदर्शन से बचने की मान्यता बनी।

लेकिन मिथिला की परंपरा यहां एक अलग रास्ता अपनाती है।

मिथिला में उसी चतुर्थी के चंद्रमा को श्रद्धापूर्वक देखा जाता है, उसकी पूजा की जाती है और उसे अर्घ्य दिया जाता है।

यही चौरचन की सबसे विशिष्ट सांस्कृतिक विशेषता है।


भगवान कृष्ण और स्यमंतक मणि की कथा

चौरचन में स्यमंतक मणि की कथा का विशेष महत्व माना जाता है।

पौराणिक कथा के अनुसार, स्यमंतक नाम की एक अद्भुत मणि को लेकर भगवान कृष्ण पर चोरी का आरोप लगा।

कृष्ण ने इस आरोप को गलत साबित करने के लिए मणि की खोज की। कथा में आगे सिंह, प्रसेन और जाम्बवान से जुड़े प्रसंग आते हैं। अंततः कृष्ण को मणि मिल जाती है और उनके ऊपर लगा आरोप समाप्त हो जाता है।

इस कथा को चौरचन की मान्यता से इसलिए जोड़ा जाता है क्योंकि यहां मिथ्या आरोप और कलंक से मुक्ति का भाव महत्वपूर्ण है।

इसी संदर्भ में चंद्रदर्शन के समय स्यमंतक मणि से जुड़ा प्रसिद्ध मंत्र पढ़ने की परंपरा है।


चौरचन में पढ़ा जाने वाला प्रसिद्ध मंत्र

चौरचन के अवसर पर कई परिवारों में स्यमंतक मणि की कथा से संबंधित मंत्र का पाठ किया जाता है।

प्रचलित श्लोक का एक प्रसिद्ध रूप है:

“सिंहः प्रसेनमवधीत् सिंहो जाम्बवता हतः।
सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्यमन्तकः॥”

इस मंत्र का संबंध भगवान कृष्ण और स्यमंतक मणि की कथा से माना जाता है।

लोकविश्वास में इसका पाठ मिथ्या दोष और कलंक से मुक्ति के लिए किया जाता है।

ध्यान देने योग्य बात यह है कि अलग-अलग परिवारों और परंपराओं में मंत्र के पाठ और उच्चारण में थोड़ा अंतर मिल सकता है।


हेमांगद ठाकुर और चौरचन की ऐतिहासिक मान्यता

चौरचन की सबसे रोचक मान्यताओं में से एक का संबंध मिथिला के राजा हेमांगद ठाकुर से है।

हेमांगद ठाकुर को 16वीं शताब्दी का विद्वान और खगोलशास्त्र से संबंधित ग्रंथ ‘ग्रहणमाला’ का रचयिता बताया जाता है। उपलब्ध विवरणों के अनुसार वे खंडवाला राजवंश से जुड़े थे और उनके नाम के साथ ग्रहणों की गणना से संबंधित विद्वत्ता की परंपरा जुड़ी हुई है।

लोककथा के अनुसार, वे मुगल सत्ता के समय बंदी बनाए गए थे। बाद में अपनी ज्योतिषीय और खगोलीय विद्वत्ता के कारण उन्हें सम्मान मिला और वे मिथिला लौटे।

इसी घटना को चौरचन की परंपरा से जोड़ने वाली मान्यता में कहा जाता है कि उनके लौटने के बाद महारानी हेमलता ने चंद्रमा की पूजा की परंपरा को विशेष रूप से प्रतिष्ठित किया।

हालांकि इस पूरी कथा के अलग-अलग संस्करण मिलते हैं और इसके सभी विवरणों को आधुनिक इतिहास की दृष्टि से निर्विवाद प्रमाणित तथ्य नहीं माना जाना चाहिए। इसलिए इसे लेख में ऐतिहासिक लोकमान्यता के रूप में समझना अधिक उचित है।


महारानी हेमलता और ‘कलंकित चांद’ की कथा

लोकपरंपरा के अनुसार, हेमांगद ठाकुर के जीवन में आए संकट और उसके समाप्त होने के बाद महारानी हेमलता ने चंद्रमा की पूजा की।

इस कथा में चंद्रमा केवल आकाशीय पिंड नहीं रह जाता, बल्कि कलंक और उससे मुक्ति का प्रतीक बन जाता है।

यही भाव धीरे-धीरे मिथिला के सामाजिक जीवन में जुड़ गया और चौरचन एक सामुदायिक लोकपर्व के रूप में स्थापित हुआ।

कुछ आधुनिक लेखों में इस परंपरा को 16वीं शताब्दी से जोड़कर बताया जाता है।


चौरचन में व्रत कौन रखता है?

परंपरागत रूप से कई मैथिल परिवारों में विवाहित महिलाएं चौरचन का व्रत रखती हैं।

हालांकि इसे केवल महिलाओं का पर्व मानना सही नहीं है। कई परिवारों में पुरुष भी पूजा में शामिल होते हैं और पूरा परिवार चंद्रमा को अर्घ्य देने के समय उपस्थित रहता है।

आज के समय में परिवार और क्षेत्र के अनुसार व्रत रखने की परंपरा अलग-अलग हो सकती है।

इसलिए चौरचन का मूल भाव परिवार की सामूहिक पूजा और चंद्रदेव के प्रति श्रद्धा है।


चौरचन पूजा की तैयारी कब से शुरू होती है?

चौरचन की तैयारी सामान्यतः पर्व के दिन सुबह से ही शुरू हो जाती है।

सुबह की तैयारी

  • घर की अच्छी तरह सफाई की जाती है।
  • पूजा स्थान को साफ किया जाता है।
  • व्रत रखने वाले व्यक्ति स्नान करके पूजा का संकल्प लेते हैं।
  • दिनभर पूजा की सामग्री जुटाई जाती है।
  • विभिन्न प्रकार के पारंपरिक पकवान तैयार किए जाते हैं।
  • शाम की पूजा के लिए अरिपन बनाने की तैयारी की जाती है।

कई परिवारों में व्रत की परंपरा कठोर होती है, जबकि कुछ परिवार अपनी कुलपरंपरा के अनुसार नियम रखते हैं।


चौरचन पूजा सामग्री की पूरी सूची

परिवार और क्षेत्र के अनुसार सामग्री में अंतर हो सकता है, लेकिन सामान्य रूप से निम्न सामग्री रखी जाती है:

पूजा की सामान्य सामग्री

  • पूजा की थाली
  • कलश
  • जल
  • अक्षत
  • रोली या सिंदूर
  • चंदन
  • फूल
  • दूर्वा
  • धूप
  • दीपक
  • घी या तेल
  • अगरबत्ती
  • कपूर
  • मौली/कलावा
  • पान
  • सुपारी
  • लौंग
  • इलायची
  • नारियल

चंद्र पूजा के लिए

  • दूध
  • जल
  • अक्षत
  • फूल
  • फल
  • दीप
  • धूप
  • नैवेद्य
  • पूजा की थाली

विशेष रूप से मिथिला की परंपरा में

  • अरिपन के लिए चावल का घोल
  • बांस की डाली या सूप/डाला
  • दही
  • मटकुरी/मिट्टी के पारंपरिक पात्र, जहां परिवार में इसकी परंपरा हो
  • विभिन्न मौसमी फल
  • घर में बनाए गए पारंपरिक पकवान

यह सूची किसी एक सार्वभौमिक शास्त्रीय सूची के रूप में नहीं लेनी चाहिए। चौरचन की सामग्री परिवार और स्थानीय मैथिल परंपरा के अनुसार बदल सकती है।

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चौरचन पर कौन-कौन से पकवान बनाए जाते हैं?

चौरचन में पूजा के लिए घर में कई प्रकार के पकवान बनाए जाते हैं।

आम तौर पर:

  • खीर
  • पूरी
  • मिठाई
  • दही
  • फल
  • पेड़ा
  • मालपुआ या अन्य पारंपरिक पकवान
  • मौसमी फल
  • घर में उपलब्ध अन्य नैवेद्य

बनाए जाते हैं।

कई परिवारों में पकवानों की संख्या और प्रकार अपनी कुलपरंपरा के अनुसार निर्धारित होते हैं।

इस पर्व की खासियत यह है कि पूजा का प्रसाद केवल धार्मिक सामग्री नहीं बल्कि मिथिला की घरेलू पाक-संस्कृति का भी प्रतिनिधित्व करता है।


चौरचन में अरिपन का क्या महत्व है?

मिथिला और अरिपन का संबंध बहुत पुराना है।

चौरचन के दिन पूजा स्थान या आंगन में चावल के घल से विशेष अरिपन बनाया जाता है।

अरिपन केवल सजावट नहीं है। यह पूजा स्थल को पवित्र बनाने और शुभता का प्रतीक माना जाता है।

कई परिवारों में चंद्रमा, पूजा की थाली और प्रसाद को अरिपन के ऊपर सजाया जाता है।

अरिपन के डिजाइन में परिवार और क्षेत्र के अनुसार अंतर होता है। इसलिए इंटरनेट पर दिखने वाला कोई एक डिजाइन ही ‘चौरचन का आधिकारिक अरिपन’ नहीं माना जाना चाहिए।


चौरचन पूजा विधि: सुबह से चंद्रदर्शन तक

अब जानते हैं कि सामान्य रूप से चौरचन की पूजा कैसे की जाती है।

चरण 1: सुबह स्नान और संकल्प

व्रती सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनते हैं और अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार व्रत का संकल्प लेते हैं।

चरण 2: दिनभर व्रत

कई परिवारों में व्रती दिनभर उपवास रखते हैं। व्रत के नियम परिवार की परंपरा के अनुसार अलग हो सकते हैं।

चरण 3: पकवान तैयार करना

घर में पूजा के लिए निर्धारित पकवान तैयार किए जाते हैं।

चरण 4: पूजा स्थान की सफाई

शाम से पहले पूजा स्थान और आंगन को साफ करके अरिपन बनाया जाता है।

चरण 5: पूजा सामग्री सजाना

पूजा की थाली, फल, दही, पकवान, दीपक और अन्य सामग्री अरिपन के पास सजाई जाती है।

चरण 6: गणेश जी की पूजा

परिवार की परंपरा के अनुसार भगवान गणेश की पूजा की जाती है।

गणेश जी को दूर्वा, फूल, अक्षत और नैवेद्य अर्पित किया जाता है।

चरण 7: चंद्रमा का इंतजार

इसके बाद परिवार चंद्रमा के दर्शन की प्रतीक्षा करता है।

चरण 8: चंद्रदर्शन

चंद्रमा दिखाई देने के बाद उसे श्रद्धापूर्वक प्रणाम किया जाता है।

चरण 9: अर्घ्य

जल, दूध या परिवार की परंपरा के अनुसार निर्धारित सामग्री से चंद्रदेव को अर्घ्य दिया जाता है।

चरण 10: मंत्र और कथा

स्यमंतक मणि से संबंधित मंत्र का पाठ किया जाता है और चौरचन की कथा सुनी जाती है।

चरण 11: नैवेद्य

चंद्रदेव को फल, पकवान, दही और अन्य नैवेद्य अर्पित किए जाते हैं।

चरण 12: परिवार की मंगलकामना

अंत में परिवार की सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य, प्रतिष्ठा और मिथ्या कलंक से रक्षा की कामना की जाती है।


चंद्रमा को अर्घ्य कैसे दें?

चौरचन पूजा का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा चंद्रमा को अर्घ्य देना है।

चंद्रमा दिखाई देने के बाद पूजा की थाली लेकर परिवार के सदस्य पूजा स्थान पर एकत्र होते हैं।

एक पात्र में स्वच्छ जल लिया जाता है। परिवार की परंपरा के अनुसार उसमें दूध या अन्य पूजनीय सामग्री मिलाई जा सकती है।

फिर चंद्रदेव की ओर मुख करके श्रद्धापूर्वक अर्घ्य दिया जाता है।

इसके साथ फूल, अक्षत और नैवेद्य अर्पित किए जाते हैं।

इसके बाद चौरचन की कथा या स्यमंतक मणि से संबंधित मंत्र का पाठ किया जाता है।


क्या चौरचन में चंद्रमा को देखना जरूरी है?

मिथिला की परंपरा में चंद्रदर्शन ही पूजा का मुख्य हिस्सा है।

यही कारण है कि परिवार शाम को चंद्रमा के निकलने की प्रतीक्षा करता है।

यहां चौरचन की परंपरा अन्य क्षेत्रों की गणेश चतुर्थी की चंद्रदर्शन संबंधी मान्यता से अलग दिखाई देती है।


गणेश चतुर्थी पर चंद्रमा न देखने और चौरचन पर चंद्रमा पूजने में अंतर

यह सवाल बहुत लोगों के मन में आता है।

गणेश चतुर्थी से जुड़ी एक प्रसिद्ध पौराणिक मान्यता में चंद्रदर्शन से मिथ्या कलंक का भय बताया जाता है।

लेकिन मिथिला की चौरचन परंपरा में उसी चतुर्थी के चंद्रमा की पूजा करके कलंक से मुक्ति की कामना की जाती है।

इसलिए दोनों परंपराओं को विरोधाभास के रूप में देखने के बजाय यह समझना अधिक उचित है कि एक ही पौराणिक कथा से अलग-अलग क्षेत्रों में अलग धार्मिक लोकपरंपराएं विकसित हुई हैं।


चौरचन का सबसे बड़ा संदेश क्या है?

चौरचन के धार्मिक पक्ष से अलग इसका एक गहरा सांस्कृतिक संदेश भी दिखाई देता है।

कलंक के डर से चंद्रमा से मुंह मोड़ने के बजाय मिथिला उसे सामने रखकर पूजा करती है।

यह मिथिला की लोकसंस्कृति की विशेषता को दिखाता है—पुरानी कथा को ज्यों का त्यों दोहराने के बजाय उसे अपनी सांस्कृतिक संवेदना के अनुसार नया अर्थ देना।

इसीलिए चौरचन केवल चंद्रमा की पूजा नहीं, बल्कि मिथिला की सांस्कृतिक पहचान भी है।


नेपाल में भी मनाया जाता है चौरचन

चौरचन केवल बिहार तक सीमित नहीं है।

नेपाल के तराई क्षेत्र में रहने वाले मैथिल समुदाय में भी चौठचंद्र/चौरचन की परंपरा मिलती है।

मिथिला की सांस्कृतिक सीमा आधुनिक राजनीतिक सीमाओं से कहीं व्यापक रही है। इसलिए भारत और नेपाल दोनों जगहों के मैथिल परिवार इस पर्व को अपनी-अपनी स्थानीय परंपराओं के साथ मनाते हैं।


चौरचन और मिथिला की संस्कृति

मिथिला के प्रमुख लोकपर्वों में चौरचन की अपनी अलग जगह है।

इसमें एक साथ कई सांस्कृतिक तत्व दिखाई देते हैं:

अरिपन → लोककला

पारंपरिक पकवान → घरेलू संस्कृति

चंद्रपूजा → धार्मिक परंपरा

स्यमंतक मणि कथा → पौराणिक परंपरा

हेमांगद ठाकुर की कथा → ऐतिहासिक लोकस्मृति

सामूहिक पूजा → सामाजिक संस्कृति

यही कारण है कि चौरचन को केवल एक व्रत या पूजा के रूप में देखना इसके व्यापक सांस्कृतिक महत्व को सीमित कर देता है।


चौरचन से जुड़े प्रमुख सवाल-जवाब

चौरचन 2026 में कब है?

चौरचन 2026 में 14 सितंबर, सोमवार को मनाया जाएगा। यह भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी का पर्व है।

चौरचन को और किन नामों से जाना जाता है?

इसे चौठचंद्र, चौठ चांद, चौरचन, चौरचन्ना और चकचन्ना आदि नामों से जाना जाता है।

चौरचन में किसकी पूजा होती है?

मुख्य रूप से चंद्रदेव की पूजा होती है। परिवार की परंपरा के अनुसार गणेश जी सहित अन्य देवी-देवताओं की भी पूजा की जाती है।

चौरचन में चंद्रमा को अर्घ्य क्यों दिया जाता है?

लोकमान्यता के अनुसार इससे मिथ्या कलंक और झूठे आरोप से मुक्ति की कामना की जाती है।

चौरचन और गणेश चतुर्थी का क्या संबंध है?

चौरचन भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी से संबंधित है और गणेश चतुर्थी भी इसी तिथि पर आती है। दोनों से जुड़ी चंद्रमा की मान्यताओं में क्षेत्रीय अंतर दिखाई देता है।

चौरचन का संबंध स्यमंतक मणि से क्यों है?

भगवान कृष्ण पर स्यमंतक मणि को लेकर लगे मिथ्या आरोप की कथा को चौरचन में कलंक से मुक्ति की मान्यता से जोड़ा जाता है।

क्या चौरचन केवल महिलाओं का पर्व है?

परंपरागत रूप से कई परिवारों में महिलाएं व्रत रखती हैं, लेकिन पूजा में परिवार के पुरुष और बच्चे भी शामिल होते हैं। नियम परिवार और क्षेत्र के अनुसार अलग हो सकते हैं।

क्या चौरचन में अरिपन बनाया जाता है?

हां। मिथिला की परंपरा में पूजा स्थल पर चावल के घोल से अरिपन बनाने की परंपरा विशेष महत्व रखती है।

चौरचन में क्या प्रसाद बनाया जाता है?

खीर, पूरी, दही, फल, मिठाई और परिवार की परंपरा के अनुसार विभिन्न पारंपरिक पकवान बनाए जाते हैं।

चौरचन की पूजा कब की जाती है?

मुख्य पूजा शाम को चंद्रदर्शन के बाद की जाती है।

चौरचन की तिथि हर साल क्यों बदलती है?

चौरचन चंद्र आधारित हिंदू पंचांग की भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी तिथि पर आधारित है। इसलिए अंग्रेजी कैलेंडर में इसकी तारीख हर साल बदलती रहती है।


चौरचन का महत्व: धर्म से आगे एक सांस्कृतिक विरासत

चौरचन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह मिथिला की धार्मिक और सांस्कृतिक दोनों परंपराओं को एक साथ जीवित रखता है।

एक तरफ इसमें गणेश और चंद्रमा की पौराणिक कथा है। दूसरी तरफ कृष्ण और स्यमंतक मणि का प्रसंग है। इसके साथ हेमांगद ठाकुर और महारानी हेमलता से जुड़ी लोकऐतिहासिक परंपरा है।

इसके अलावा घर का आंगन, अरिपन, मिट्टी के पारंपरिक पात्र, दही, फल, पकवान और परिवार के सभी सदस्यों का एक साथ चंद्रमा की प्रतीक्षा करना—ये सभी इसे मिथिला के जीवन से जोड़ते हैं।

आज मिथिला के लोग देश के अलग-अलग हिस्सों और विदेशों में भी रहते हैं। इसके बावजूद चौरचन की परंपरा उनके साथ यात्रा कर रही है।

यही किसी लोकपर्व की सबसे बड़ी शक्ति है।


निष्कर्ष

चौरचन केवल चंद्रमा की पूजा का पर्व नहीं है। यह मिथिला की स्मृति, आस्था, लोककथा, कला, भोजन और पारिवारिक परंपरा का उत्सव है।

जहां एक ओर इसकी पौराणिक मान्यता चंद्रमा और गणेश जी की कथा से जुड़ी है, वहीं भगवान कृष्ण और स्यमंतक मणि की कथा इसे मिथ्या आरोप से मुक्ति का प्रतीक बनाती है। दूसरी ओर हेमांगद ठाकुर और महारानी हेमलता से जुड़ी लोकपरंपरा इसे मिथिला के इतिहास और सांस्कृतिक स्मृति से जोड़ती है।

चौरचन का सबसे सुंदर संदेश शायद यही है—

मिथिला उस चांद को भी श्रद्धा से देखती है, जिसे दूसरी परंपरा में कलंक का कारण माना गया।

इसीलिए चौरचन मिथिला की एक ऐसी विशिष्ट पहचान है, जिसमें आस्था के साथ तर्क, कथा के साथ इतिहास, पूजा के साथ कला और धर्म के साथ लोकजीवन दिखाई देता है।

हर वर्ष भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी की शाम जब मिथिला के आंगनों में अरिपन सजता है, पकवानों की खुशबू फैलती है और परिवार चंद्रमा के निकलने की प्रतीक्षा करता है, तब केवल एक पूजा नहीं होती—मिथिला अपनी सदियों पुरानी सांस्कृतिक स्मृति को एक बार फिर जीवित करती है।

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✍️ About the Author

Fanish Jha

Fanish Jha is a digital publisher, website creator, and content editor focused on creating useful online resources for Indian audiences. He is the founder and editor of Pincode Of IndiaJobs.PincodeOfIndiaIndian Swan, and Gaon Express.

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Founder & Editor — Fanish Jha


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