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मधुश्रावणी पर्व 2027: मिथिला की अनोखी परंपरा, इतिहास, पूजा विधि, कथा एवं संपूर्ण पूजा सामग्री सूची

मधुश्रावणी पर्व 2027 की संपूर्ण जानकारी। जानिए मधुश्रावणी का इतिहास, पूजा विधि, नाग पूजा, बिहुला कथा, तेमी परंपरा और 60+ पूजा सामग्री की पूरी सूची। Complete Date wise Details 2027.
मधुश्रावणी पर्व 2027 की संपूर्ण जानकारी। जानिए मधुश्रावणी का इतिहास, पूजा विधि, नाग पूजा, बिहुला कथा, तेमी परंपरा और 60+ पूजा सामग्री की पूरी सूची। Complete Date wise Details 2027.

मधुश्रावणी पर्व क्या है?

मधुश्रावणी मिथिलांचल का एक अत्यंत प्राचीन और लोकप्रिय लोकपर्व है, जिसे मुख्य रूप से नवविवाहित महिलाएँ अपने पति की दीर्घायु, सुखी वैवाहिक जीवन और पारिवारिक समृद्धि के लिए मनाती हैं। यह पर्व बिहार के मिथिला क्षेत्र तथा नेपाल के मधेश प्रदेश में विशेष उत्साह के साथ मनाया जाता है।

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“मधु” का अर्थ है मिठास और “श्रावणी” का संबंध सावन मास से है। इस प्रकार मधुश्रावणी का अर्थ है सावन की मिठास और नवदांपत्य जीवन के प्रेम, विश्वास तथा समर्पण का उत्सव।

यह पर्व सावन कृष्ण पक्ष पंचमी से आरंभ होकर सावन शुक्ल पक्ष तृतीया तक लगभग 13 से 15 दिनों तक चलता है।


मधुश्रावणी पर्व का पौराणिक महत्व

मधुश्रावणी पर्व का संबंध भगवान शिव, माता पार्वती तथा नाग देवताओं से जुड़ा हुआ है।

लोक मान्यता के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को प्रत्येक जन्म में पति रूप में प्राप्त करने के लिए यह व्रत किया था। इसलिए नवविवाहित महिलाएँ भी इस व्रत को रखकर सुखी दांपत्य जीवन की कामना करती हैं।

मिथिला की लोककथाओं में भगवान शिव की पाँच नाग कन्याओं का वर्णन मिलता है—

  • जय विषहरी
  • धोथिला भवानी
  • पद्मावती
  • मैना विषहरी
  • मनसा विषहरी

इन्हीं नाग देवियों की पूजा मधुश्रावणी के दौरान विशेष रूप से की जाती है।

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बिहुला और विषहरी की कथा

मधुश्रावणी का सबसे प्रसिद्ध प्रसंग बिहुला और विषहरी की कथा है।

कथा के अनुसार बिहुला अपने पति को नागदंश से बचाने के लिए कठिन तपस्या करती है और अंततः देवताओं को प्रसन्न कर अपने पति को पुनर्जीवन दिलाती है।

यह कथा नारी के प्रेम, त्याग, समर्पण और अटूट विश्वास का प्रतीक मानी जाती है।


मधुश्रावणी पर्व कब मनाई जाती है?

सावन कृष्ण पक्ष पंचमी से प्रारंभ होकर सावन शुक्ल तृतीया तक यह पर्व चलता है।

वर्ष 2027 में भी मिथिला क्षेत्र में यह पर्व परंपरागत विधि से मनाया जाएगा।

मिथिला संस्कृति और लोक परंपराएँ


मधुश्रावणी पर्व 2027: मधुश्रावणी की दैनिक पूजा विधि

पहला दिन

  • स्नान करके गोसाईं घर या कोहबर घर की सफाई।
  • अरिपन (अल्पना) बनाना।
  • पूजा स्थल तैयार करना।
  • फूल एवं पत्तियों का संग्रह।

प्रतिदिन की पूजा

  • नाग देवता, भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा।
  • ताजे फूल अर्पित करना।
  • लोककथाओं का श्रवण।
  • मधुश्रावणी गीतों का गायन।
  • एक समय भोजन।

अंतिम दिन

  • विशेष पूजा।
  • सिंदूरदान।
  • विसर्जन।
  • पारंपरिक मधुश्रावणी अनुष्ठान।

मधुश्रावणी पर्व में सुनाई जाने वाली प्रमुख कथाएँ

मधुश्रावणी के दौरान 14 दिनों तक विभिन्न धार्मिक एवं लोककथाएँ सुनाई जाती हैं—

  1. शिव-पार्वती विवाह
  2. गंगा अवतरण
  3. समुद्र मंथन
  4. नाग-नागिन कथा
  5. बिहुला-विषहरी कथा
  6. शिव परिवार की कथा
  7. नाग कन्याओं की उत्पत्ति
  8. देवी विषहरी महिमा

प्रत्येक कथा के अंत में “बाँचो बिन्नी” का पाठ किया जाता है।

मिथिला की सांस्कृतिक विरासत


मधुश्रावणी पर्व 2027: मधुश्रावणी में गाए जाने वाले लोकगीत

मधुश्रावणी के दौरान मैथिली लोकगीतों का विशेष महत्व होता है।

प्रसिद्ध पंक्तियाँ:

“पुरैनिक पत्ता, झिलमिल लत्ता,
ताहि चढ़ि बैसलि विषहरी माता।
हाथ सुपारी, खोइंचा पान,
विषहरी माता करथि शुभ कल्याण।”


मधुश्रावणी पर्व 2027: मधुश्रावणी पूजा सामग्री सूची

You can Also Explore Our Madhushrawani Puja Samagri Collection

1. बाँस की सामग्री


2. मिट्टी की सामग्री

  • पुरहर
  • पातिल
  • हाथी
  • सरबा
  • मटकूरी
  • दीप
  • विषहरा
  • कलश
  • मिट्टी का पात्र

3. फूल एवं पत्तियाँ

  • जूही
  • चमेली
  • अगर फूल
  • टगर
  • कुसुम
  • मेहंदी
  • मैना पत्ता
  • आम का पत्ता
  • केला पत्ता
  • अरबी (मैन) का पत्ता

4. पूजन सामग्री

  • धान का लावा
  • लाल रंग का धान
  • हर्रे
  • बहेड़े
  • जोंगी
  • जाफर
  • डोका
  • चंदन
  • सिंदूर
  • काजल
  • रोली
  • अक्षत
  • पान
  • सुपारी

5. श्रृंगार सामग्री

  • सिंदूर
  • मेहंदी
  • चूड़ियाँ
  • बिछिया
  • पायल
  • महावर
  • मांगटीका
  • चुनरी
  • साड़ी

6. प्रसाद सामग्री

  • पंचामृत
  • दूध
  • दही
  • घी
  • शहद
  • चीनी
  • केला
  • आम
  • मिठाई
  • मखाना

मधुश्रावणी पर्व 2027: मधुश्रावणी और पर्यावरण

मधुश्रावणी केवल धार्मिक पर्व नहीं है, बल्कि प्रकृति संरक्षण का संदेश भी देता है।

इस पर्व में—

  • फूलों का महत्व
  • वृक्षों की पूजा
  • नाग संरक्षण
  • जैव विविधता का सम्मान

स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

भारत की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत


तेमी परंपरा: परंपरा और आधुनिक दृष्टिकोण

मधुश्रावणी के अंतिम दिन कुछ समुदायों में “तेमी” की परंपरा निभाई जाती थी।

इसमें घी में भीगी रूई की बाती को नवविवाहिता के घुटने या पैर से स्पर्श कराया जाता था।

मान्यता थी कि इससे पति की आयु लंबी होती है।

आज अधिकांश स्थानों पर इस प्रथा का स्थान “शीतल तेमी” ने ले लिया है, जिसमें प्रतीकात्मक रूप से चंदन या बुझी हुई बाती का उपयोग किया जाता है।


मधुश्रावणी पर्व का सांस्कृतिक महत्व

मधुश्रावणी मिथिला की सांस्कृतिक पहचान है।

यह पर्व—

  • पति-पत्नी के प्रेम का प्रतीक है।
  • लोककथाओं को जीवित रखता है।
  • नाग पूजा की परंपरा को संरक्षित करता है।
  • नवविवाहित महिलाओं को सामाजिक एवं सांस्कृतिक शिक्षाएँ प्रदान करता है।
  • प्रकृति और मानव के बीच सामंजस्य का संदेश देता है।

मधुश्रावणी पर्व 2027: निष्कर्ष

मधुश्रावणी केवल एक व्रत नहीं बल्कि मिथिला की हजारों वर्षों पुरानी सांस्कृतिक विरासत है। यह पर्व प्रेम, समर्पण, प्रकृति, लोककला, लोककथा और पारिवारिक मूल्यों का अद्भुत संगम है। आधुनिक समय में भी इसकी प्रासंगिकता बनी हुई है और यह नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का कार्य कर रहा है।

Mithila Bamboo Dala for Madhushrawani Puja | Handmade Traditional Ritual Basket
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Mithila Panpathiya for Madhushrawani Puja | Handmade Bamboo Ritual Basket-1
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Madhushrawani Bamboo Puja Set (Panpathiya 7 + Lilli Mauni 7 + Dala 7)
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मधुश्रावणी पर्व 2027 (Madhushravani 2027)

  • आरंभ (श्रावण कृष्ण पंचमी / मौना पंचमी): 23 जुलाई 2027, शुक्रवार
  • समापन (श्रावण शुक्ल तृतीया / मधुश्रावणी समापन एवं टेमी): 4 अगस्त 2027, बुधवार

कुल अवधि

  • 23 जुलाई 2027 से 4 अगस्त 2027
  • कुल 13 दिनों का पारंपरिक मधुश्रावणी व्रत एवं पूजा-अनुष्ठान।

मुख्य कार्यक्रम

  • 23 जुलाई 2027 (शुक्रवार): श्रावण कृष्ण पंचमी/मौना पंचमी के दिन मधुश्रावणी पूजा एवं व्रत का शुभारंभ।
  • अगले दिनों में नवविवाहिता द्वारा भगवान शिव, माता गौरी, विषहरी माता तथा नाग-नागिन की पूजा, फूल संग्रह, कथा-श्रवण एवं मैथिली लोकगीतों की परंपरा।
  • पूरे 13 दिनों के दौरान मधुश्रावणी से जुड़ी विभिन्न पारंपरिक कथाओं और पूजा-अनुष्ठानों का आयोजन।
  • 4 अगस्त 2027 (बुधवार): श्रावण शुक्ल तृतीया के दिन मधुश्रावणी का समापन, विशेष पूजा और टेमी (तेमी दागने की रस्म)

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✍️ About the Author

Fanish Jha

Fanish Jha is a digital publisher, website creator, and content editor focused on creating useful online resources for Indian audiences. He is the founder and editor of Pincode Of IndiaJobs.PincodeOfIndiaIndian Swan, and Gaon Express.

His work includes website development, digital publishing, SEO, content research, and managing online platforms across postal information, government resources, e-commerce, and local services.

He aims to make online information clear, useful, accessible, and easy to understand.

Founder & Editor — Fanish Jha


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